डुमरांव की सरकारी नर्सरी में ताला, जलजमाव ने बुझाई हरियाली की उम्मीद

किसानों को नई तकनीक से जोड़ने, फलोत्पादन को बढ़ावा देने और कृषि अनुसंधान का केंद्र बनने की जिस सरकारी नर्सरी की कभी परिकल्पना की गई थी, आज वही व्यवस्था की उदासीनता का शिकार होकर अपनी पहचान खोती जा रही है। डुमरांव प्रखंड स्थित कृषि विभाग की इकलौती सरकारी उद्यान नर्सरी इन दिनों जलजमाव, जंगली घास-फूस, टूटती चहारदीवारी और बंद पड़े मुख्य द्वार की कहानी बयां कर रही है।

डुमरांव की सरकारी नर्सरी में ताला, जलजमाव ने बुझाई हरियाली की उम्मीद

__ कभी फलों की नीलामी से सरकार को होती थी आमदनी, अब टूटती दीवारें, सूखते पेड़ और गंदे पानी के बीच सिमटा उद्यान का अस्तित्व

केटी न्यूज/डुमरांव।

किसानों को नई तकनीक से जोड़ने, फलोत्पादन को बढ़ावा देने और कृषि अनुसंधान का केंद्र बनने की जिस सरकारी नर्सरी की कभी परिकल्पना की गई थी, आज वही व्यवस्था की उदासीनता का शिकार होकर अपनी पहचान खोती जा रही है। डुमरांव प्रखंड स्थित कृषि विभाग की इकलौती सरकारी उद्यान नर्सरी इन दिनों जलजमाव, जंगली घास-फूस, टूटती चहारदीवारी और बंद पड़े मुख्य द्वार की कहानी बयां कर रही है। जिस परिसर में कभी फलदार पौधों और पेड़ों की हरियाली नजर आती थी, वहां अब गंदे पानी और वीरानी का कब्जा है।एक समय इस उद्यान से आम, कटहल, अमरूद समेत विभिन्न फलदार पेड़ों के उत्पादन से विभाग को राजस्व भी प्राप्त होता था। फलों की नीलामी के लिए हर वर्ष प्रक्रिया अपनाई जाती थी और इससे सरकारी खजाने में राशि पहुंचती थी। लेकिन वर्षों से रखरखाव के अभाव ने पूरी व्यवस्था को पटरी से उतार दिया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, नर्सरी का मुख्य गेट लंबे समय से बंद पड़ा है। अंदर जाने का रास्ता भी जलजमाव और कीचड़ के कारण दुर्गम बना हुआ है।

__ शोध और प्रयोग की योजना भी कागजों में सिमटी

नर्सरी को केवल फल उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय इसे कृषि अनुसंधान और प्रयोग का केंद्र बनाने की योजना भी सामने आई थी। वर्ष 2022 में डुमरांव कृषि कॉलेज के छात्र-छात्राओं और कृषि वैज्ञानिकों को यहां शोध एवं नई कृषि तकनीकों पर काम करने की अनुमति दिए जाने की बात कही गई थी। तत्कालीन कृषि मंत्री अमरेन्द्र प्रताप सिंह की पहल पर इसे अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना भी बनी थी।मकसद था कि छात्र यहां प्रयोगात्मक खेती करें, फलदार पौधों की नई किस्मों पर अध्ययन हो और विकसित तकनीक का लाभ सीधे किसानों तक पहुंचे। लेकिन समय बीतता गया और यह महत्वाकांक्षी योजना धरातल पर आकार लेने के बजाय फाइलों में ही सिमटकर रह गई। आज शोध की गतिविधियों की जगह परिसर में सन्नाटा पसरा हुआ है।

__नाले ने बढ़ाई मुसीबत, नर्सरी में पहुंच रहा कॉलोनियों का पानी

नर्सरी की बदहाली में जलजमाव सबसे बड़ी वजह बनकर सामने आया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, करीब दो वर्ष पूर्व महरौरा रोड की नई बस्तियों के पानी की निकासी के लिए नर्सरी के सामने नाले की खुदाई कराई गई थी। लेकिन पानी की निकासी का समुचित प्रबंध नहीं होने के कारण बारिश और नाले का पानी नर्सरी परिसर में ही जमा होने लगा।लगातार पानी में डूबे रहने के कारण आम, अमरूद, शीशम समेत कई पेड़ सूख चुके हैं। लंबे समय तक जलभराव से मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। जलनिकासी की स्थायी व्यवस्था नहीं होने से हर बारिश के बाद समस्या और गंभीर हो जाती है।

__ टूटी दीवार बनी सुरक्षा का सवाल

उद्यान की पिछली चहारदीवारी कई स्थानों पर टूट चुकी है। इससे परिसर में अनधिकृत आवाजाही का रास्ता खुल गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शाम ढलने के बाद यहां असामाजिक तत्वों का जमावड़ा भी देखने को मिलता है। सुरक्षा और निगरानी की व्यवस्था नहीं होने से सरकारी संपत्ति की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।समाजसेवी प्रदीप शरण, धीरज कुमार सहित स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नर्सरी को सिर्फ चारदीवारी और पेड़ों के एक भूखंड के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह किसानों, कृषि छात्रों और क्षेत्र की हरित अर्थव्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण सरकारी संपत्ति है। यदि तत्काल जलनिकासी, सफाई, सुरक्षा और पौध संरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई तो यह परिसर पूरी तरह उजड़ जाएगा।स्थानीय लोगों ने कृषि विभाग और नगर परिषद से संयुक्त पहल कर नर्सरी के जीर्णोद्धार, जलनिकासी और सुरक्षा की स्थायी व्यवस्था कराने की मांग की है, ताकि बंद पड़ी यह सरकारी संपत्ति फिर से किसानों के प्रयोग, पौध उत्पादन और कृषि अनुसंधान का केंद्र बन सके।