__ 6 नवंबर को मनेगी धन्वन्तरि जयंती, क्षीरसागर मंथन से अमृत कलश और औषधियों के साथ हुआ था भगवान का प्राकट्य; महालक्ष्मी-कुबेर पूजन के लिए वृष लग्न सर्वोत्तम, यम दीपदान का भी विशेष महत्व
केटी न्यूज/बक्सर।
धन, वैभव, सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की मंगलकामना का पर्व धनतेरस इस वर्ष 6 नवंबर को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। पांच दिवसीय दीपावली महापर्व का शुभारंभ करने वाले इस पर्व को लेकर बाजारों में अभी से उत्साह का माहौल है। सोने-चांदी के आभूषण, बर्तन और विभिन्न धातुओं से निर्मित वस्तुओं की खरीदारी को लेकर बाजारों में विशेष रौनक रहने की उम्मीद है। वहीं, घरों और प्रतिष्ठानों में भगवान धन्वन्तरि, माता महालक्ष्मी तथा भगवान कुबेर की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी। इस दिन भगवान धन्वन्तरि की जयंती भी मनाई जाएगी।धनतेरस के धार्मिक महत्व, पूजा के शुभ मुहूर्त और दीपदान की परंपराओं को लेकर आचार्य नरोत्तम द्विवेदी ने विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि धनतेरस केवल धन-संपत्ति अर्जित करने और खरीदारी का पर्व नहीं है, बल्कि यह आरोग्य, आयुर्वेद और निरोगी जीवन के प्रति भारतीय संस्कृति की गहरी आस्था का भी प्रतीक है।

__ क्षीरसागर मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे भगवान धन्वन्तरि
आचार्य द्विवेदी ने बताया कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को भगवान धन्वन्तरि का प्राकट्योत्सव मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवताओं और असुरों द्वारा किए गए क्षीरसागर मंथन के दौरान भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश और संसार के समस्त रोगों के उपचार में उपयोगी औषधियों के साथ प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद का प्रवर्तक तथा देवताओं का वैद्य माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन चिकित्सकों, वैद्यों, औषधि निर्माताओं और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों द्वारा विशेष रूप से उनकी पूजा की जाती है। भगवान धन्वन्तरि की आराधना के माध्यम से लोग स्वस्थ, दीर्घायु और निरोगी जीवन की कामना करते हैं।

__सोना-चांदी और धातुओं की खरीदारी मानी जाती है शुभ
आचार्य नरोत्तम द्विवेदी के अनुसार, धनतेरस पर सोने-चांदी के आभूषण, चांदी के बर्तन, तांबे-पीतल सहित अन्य धातुओं की वस्तुएं, धातु की मूर्तियां और झाड़ू खरीदना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन शुभ मुहूर्त में खरीदारी और महालक्ष्मी-कुबेर का पूजन करने से घर में धन-धान्य तथा सुख-समृद्धि का वास होता है।

__महालक्ष्मी-कुबेर पूजन के लिए वृष लग्न सर्वोत्तम
आचार्य द्विवेदी ने धनतेरस पर खरीदारी और पूजन के लिए विभिन्न लग्न मुहूर्तों की जानकारी देते हुए बताया कि कुंभ लग्न दोपहर 1:07 से 2:39 बजे तक सर्वोत्तम, मीन लग्न 2:39 से 4:07 बजे तक मध्यम, प्रदोष काल में वृष लग्न शाम 5:45 से 7:42 बजे तक सर्वोत्तम तथा मिथुन लग्न रात 7:42 से 9:56 बजे तक मध्यम रहेगा। उन्होंने बताया कि विशेषकर प्रदोष काल का वृष लग्न महालक्ष्मी और कुबेर पूजन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।

__ यम दीपदान से अकाल मृत्यु के भय से रक्षा की मान्यता
धनतेरस की शाम यम दीपदान की भी विशेष परंपरा है। इस दिन तिल या सरसों के तेल का दीपक जलाकर घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखना चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि यमराज के निमित्त दीपदान करने से अकाल मृत्यु के भय और मृत्यु संबंधी अरिष्ट से रक्षा होती है। इस अवसर पर निम्न मंत्र से दीपदान करने का विधान बताया गया है—'मृत्युना पाशदण्डाभ्याम् कालेन यमया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम।।'

__ 7 नवंबर को नरक चतुर्दशी, चार बत्ती वाले दीप का विधान
आचार्य द्विवेदी ने बताया कि 7 नवंबर को नरक चतुर्दशी मनाई जाएगी। इस दिन घर के मुख्य द्वार के बाहर तिल या सरसों के तेल से चार बत्तियों वाला दीपक जलाकर दीपदान करने की परंपरा है। इसे चतुर्वर्ती दीपदान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दीपदान से पापों का नाश और धर्मराज की प्रसन्नता प्राप्त होती है। इसके लिए निम्न मंत्र का विधान है—
__'ततो दीप चतुर्दश्यां नरक प्रीतये मया। चतुर्वर्ती समायुक्तः सर्वपाप प्रणुतये।।'
आचार्य नरोत्तम द्विवेदी ने कहा कि धनतेरस का पर्व हमें धन-संपदा के साथ स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुखमय जीवन का महत्व भी समझाता है। भगवान धन्वन्तरि की आराधना, माता महालक्ष्मी और कुबेर का पूजन तथा यम दीपदान जैसी परंपराएं इस पर्व की आध्यात्मिक महत्ता को और बढ़ाती हैं। उन्होंने लोगों से श्रद्धा, पवित्रता और विधि-विधान के साथ पर्व मनाने की अपील की।





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