102 साल पुरानी रामलीला पर लगा ताला खुला
चौसा की 102 साल पुरानी रामलीला की परंपरा पर ताला लगाने के फैसले ने ऐसा विवाद खड़ा किया कि नगर पंचायत कार्यालय में चार घंटे से अधिक समय तक तालाबंदी करनी पड़ी। स्थानीय लोगों के आक्रोश और लगातार विरोध के बाद आखिरकार प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा।

__ एसडीएम-एसडीपीओ की पहल पर सुलझा विवाद, चार घंटे से अधिक नगर पंचायत कार्यालय में चली तालाबंदी; ईओ ने खुद खोला रामलीला मंच का ताला
केटी न्यूज/चौसा।
चौसा की 102 साल पुरानी रामलीला की परंपरा पर ताला लगाने के फैसले ने ऐसा विवाद खड़ा किया कि नगर पंचायत कार्यालय में चार घंटे से अधिक समय तक तालाबंदी करनी पड़ी। स्थानीय लोगों के आक्रोश और लगातार विरोध के बाद आखिरकार प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा। बुधवार को सदर एसडीएम अविनाश कुमार और एसडीपीओ गौरव पांडेय की पहल पर विवाद का पटाक्षेप हुआ। एसडीएम ने कार्रवाई पर खेद जताया, जबकि कार्यपालक पदाधिकारी रानी कुमारी ने साक्षरता भवन सह रामलीला मंच का ताला अपने हाथों से खोल दिया। ताला खुलते ही मौके पर मौजूद लोगों ने जय श्रीराम के नारे लगाए।

दरअसल, चौसा बाजार स्थित साक्षरता भवन सह रामलीला मंच पर मंगलवार शाम कायाकल्प योजना के तहत जांच के दौरान गंदगी मिलने के बाद ईओ ने ताला लगवा दिया था। इस कार्रवाई को स्थानीय लोगों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था से जोड़ते हुए विरोध शुरू कर दिया। उनका कहना था कि एक सदी से अधिक पुरानी रामलीला चौसा की पहचान है। ऐसे में व्यवस्था सुधारने के नाम पर मंच बंद करना उचित नहीं है।

__ तालाबंदी से बढ़ा दबाव, अधिकारियों ने संभाला मोर्चा
बुधवार को आक्रोशित लोगों ने नगर पंचायत कार्यालय में तालाबंदी कर दी। इससे प्रशासनिक महकमे में हलचल तेज हो गई। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम अविनाश कुमार और एसडीपीओ गौरव पांडेय मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने स्थानीय नागरिकों से बातचीत कर उनकी आपत्तियां सुनीं। इसके बाद सभी संबंधित अधिकारी रामलीला मंच पहुंचे, जहां बातचीत के बाद ताला खोलने पर सहमति बनी।

__ बातचीत से निकला समाधान, आगे के लिए मिला संदेश
एसडीएम ने स्वीकार किया कि रामलीला बंद नहीं होनी चाहिए थी। किसी तरह की समस्या होने पर बैठक और संवाद के जरिए समाधान निकाला जा सकता था। वहीं, ईओ रानी कुमारी ने स्पष्ट किया कि रामलीला रोकना उनकी मंशा नहीं थी। प्रशासनिक पहल से विवाद समाप्त होने के बाद स्थानीय लोगों ने राहत जताई। इस घटनाक्रम ने यह संदेश दिया कि सार्वजनिक स्थलों की व्यवस्था सुधारने के लिए कार्रवाई जरूरी है, लेकिन स्थानीय परंपराओं और जनभावनाओं को ध्यान में रखकर संवाद के रास्ते समाधान निकालना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

