आवास योजना की पारदर्शिता पर सवाल : प्लास्टिक की छत के नीचे बुजुर्ग भाई-बहन, फिर भी आवास योजना की सूची से बाहर

सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत क्या है, इसकी तस्वीर चौगाईं प्रखंड के ओझाबरांव में शुक्रवार को उस वक्त सामने आई, जब बुजुर्ग भाई-बहन ललन ओझा और जयतारा की जिंदगी बदहाली के बीच गुजरती मिली। सिर पर पक्की छत नहीं, बारिश और धूप से बचने के लिए प्लास्टिक का सहारा और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी संघर्ष—इसके बावजूद दोनों सरकारी आवास योजना का लाभ पाने वालों की सूची में नहीं पहुंच सके।

आवास योजना की पारदर्शिता पर सवाल : प्लास्टिक की छत के नीचे बुजुर्ग भाई-बहन, फिर भी आवास योजना की सूची से बाहर

__ ओझाबरांव में बदहाली की तस्वीर ने खोली सरकारी योजनाओं के चयन की पोल, समाजसेवियों ने पहुंचाई मदद तो सिस्टम से उठे कई सवाल

केटी न्यूज/चौगाईं।

सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत क्या है, इसकी तस्वीर चौगाईं प्रखंड के ओझाबरांव में शुक्रवार को उस वक्त सामने आई, जब बुजुर्ग भाई-बहन ललन ओझा और जयतारा की जिंदगी बदहाली के बीच गुजरती मिली। सिर पर पक्की छत नहीं, बारिश और धूप से बचने के लिए प्लास्टिक का सहारा और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी संघर्ष—इसके बावजूद दोनों सरकारी आवास योजना का लाभ पाने वालों की सूची में नहीं पहुंच सके। इस मामले ने आवास योजना के लाभुक चयन में पारदर्शिता के दावों की पोल खोलकर रख दी है।बुजुर्ग भाई-बहन की स्थिति की जानकारी सामने आने के बाद बक्सर के युवा समाजसेवी रामजी सिंह, व्यवसायी अजय मानसिंहका समेत अन्य समाजसेवी शुक्रवार को ओझाबरांव पहुंचे।

समाजसेवियों ने दोनों की तत्काल जरूरतों को देखते हुए गैस चूल्हा, पंखा, बक्सा, बर्तन, खाद्य सामग्री समेत अन्य जरूरी सामान उपलब्ध कराया। मदद का सामान लेकर पहुंचे लोगों को देखकर दोनों बुजुर्गों के चेहरे पर लंबे समय बाद राहत की झलक दिखाई दी।समाजसेवियों ने कहा कि जिस उम्र में बुजुर्गों को सरकारी योजनाओं और सामाजिक सहयोग के सहारे सुरक्षित जीवन मिलना चाहिए, उस उम्र में उनका प्लास्टिक की छत के नीचे रहना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यदि वास्तव में दोनों जरूरतमंद हैं तो फिर आवास योजना के सर्वे और लाभुक चयन के दौरान उनकी स्थिति अधिकारियों और संबंधित कर्मियों की नजर से कैसे छूट गई, यह जांच का विषय है।

सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जब आवासविहीन और अत्यंत जरूरतमंद परिवार सरकारी योजनाओं की सूची से बाहर रह जाते हैं, तो लाभुकों के चयन की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? क्या सर्वे और सत्यापन महज कागजी प्रक्रिया बनकर रह गया है? ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे मामलों की जांच कर वास्तविक जरूरतमंदों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।समाजसेवियों ने भरोसा दिलाया कि दोनों बुजुर्गों की जरूरत के अनुसार आगे भी सहयोग जारी रहेगा। वहीं, ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की कि ललन ओझा और जयतारा को तत्काल आवास, राशन, पेंशन समेत अन्य पात्र सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाया जाए, ताकि सरकारी योजना का लाभ कागजों में नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की जिंदगी में दिखाई दे।