भारतीय ज्ञान परंपरा पर मंथन, मानवता के संदेश से गूंजा एमवी कॉलेज
महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय के मानस सभागार में मंगलवार को आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी “भारतीय ज्ञान परंपरा में मानवता: एक अनंत यात्रा” का भव्य शुभारंभ हुआ। दीप प्रज्वलन और महर्षि विश्वामित्र की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ कार्यक्रम का आगाज गरिमामय वातावरण में हुआ। संगोष्ठी में देश-विदेश से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष बना दिया।


--अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन विद्वानों ने बताया— भारतीय दर्शन विश्व को दे सकता है नई दिशा
केटी न्यूज/बक्सर
महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय के मानस सभागार में मंगलवार को आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी “भारतीय ज्ञान परंपरा में मानवता: एक अनंत यात्रा” का भव्य शुभारंभ हुआ। दीप प्रज्वलन और महर्षि विश्वामित्र की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ कार्यक्रम का आगाज गरिमामय वातावरण में हुआ। संगोष्ठी में देश-विदेश से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष बना दिया।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) कृष्ण कांत सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल सिद्धांतों का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन को मानवीय मूल्यों के साथ जीने की कला है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली आधुनिक विज्ञान को भी मानवीय दृष्टिकोण प्रदान करती है और आज के वैश्विक दौर में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है।

मुख्य वक्ता प्रो. रमेश चंद्र नेगी ने भारतीय और बौद्ध दर्शन के समन्वय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि करुणा और प्रज्ञा भारतीय ज्ञान के मूल आधार हैं। उन्होंने कहा कि यही मूल्य व्यक्ति को विश्व नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं। वहीं वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. श्री प्रकाश राय ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को भारतीय ज्ञान परंपरा का सर्वोच्च मानवीय संदेश बताते हुए कहा कि साहित्य और दर्शन का मूल उद्देश्य मनुष्यता की रक्षा करना है।शिक्षा संकायाध्यक्ष प्रो. रविकांत ने नई शिक्षा नीति के संदर्भ में प्राचीन शिक्षण पद्धतियों की उपयोगिता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की प्रक्रिया होनी चाहिए।

अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रो. वाचस्पति द्विवेदी ने ‘स्पिरिचुअल ह्यूमैनिटीज’ विषय पर व्याख्यान देते हुए बताया कि भारतीय दर्शन ने विश्व साहित्य और वैश्विक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया है।भोजनावकाश के बाद आयोजित तकनीकी सत्र में जेपी विश्वविद्यालय के प्रो. उदय शंकर ओझा ने लोक ज्ञान और मौखिक परंपराओं को मानवता की वास्तविक धरोहर बताया। उन्होंने कहा कि लोक परंपराओं को अकादमिक विमर्श में समुचित स्थान मिलना चाहिए। इस दौरान विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए करीब 40 शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम का प्रभावी संचालन सह-संयोजक डॉ. प्रीति मौर्या ने किया, जबकि डॉ. ओम प्रकाश आर्य ने अतिथियों का परिचय कराया। आयोजन की रूपरेखा संयोजक एवं अंग्रेजी विभागाध्यक्ष श्री प्रियेश रंजन ने प्रस्तुत की। प्रथम दिवस का समापन आयोजन सचिव एवं संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. रवि प्रभात के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।संगोष्ठी के दूसरे दिन 13 मई को विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शैलेन्द्र कुमार चतुर्वेदी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इस दौरान महाविद्यालय के संकलित ग्रंथों का विमोचन, तकनीकी सत्र, प्रमाण पत्र वितरण तथा तोलाराम ग्रुप के प्रतिनिधियों की ऑनलाइन सहभागिता भी होगी।

