दीपावली पर्व को लेकर मिट्टी के दिया दियरी और खिलौनों की बढ़ी मांग, निर्माण में जुटे कुम्हार

दीपावली एक ऐसा पर्व है, जिसे खुशी के साथ घर-घर मनाया जाता है। बच्चों में जहां पटाखा को लेकर उल्लास रहता है, वहीं घर की महिलाएं मां लक्ष्मी की पूजा घर में उनके आगमन को लेकर करती हैं। यह मान्यता है कि जिस घर में मां लक्ष्मी का वास रहता है,

दीपावली पर्व को लेकर मिट्टी के दिया दियरी और खिलौनों की बढ़ी मांग, निर्माण में जुटे कुम्हार

केटी न्यूज/डुमरांव

दीपावली एक ऐसा पर्व है, जिसे खुशी के साथ घर-घर मनाया जाता है। बच्चों में जहां पटाखा को लेकर उल्लास रहता है, वहीं घर की महिलाएं मां लक्ष्मी की पूजा घर में उनके आगमन को लेकर करती हैं। यह मान्यता है कि जिस घर में मां लक्ष्मी का वास रहता है, वह घर धन्य-धान्य से परिपूर्ण रहता है। इस अवसर पर घरो में घरौंदा भी बनया जाता है, जहां पर परिवार और मोहल्ले की महिलाएं एकजुट होकर गीत गाती हैं, फिर प्रसाद रूप में मूरी, लावा, लड्डु का वितरण किया जाता है। इस पर्व का कुम्हार बिरादरी के लोग एक साल तक इंतजार करते हैं। हालांकि इनका कहना है कि मिट्टी मंहगा हो जाने के कारण इससे बने बर्तन भी मंहगा बेचना पड़ता है। मालूम हो कि पहले मिट्टी काफी सस्ता हुआ करता था, लेकिन उसका डिमांड बढ़ने से मंहगा हो गया है। जिस तरह से शहर में मकान बनाए जा रहे हैं, उसी के अनुसार मिट्टी की डिमांड बढ़ती जा रही है। मकान बनाने में काम लगाने से पहले परती जमीन की ऊंचाई बढ़ाने के लिए मिट्टी से भरा जाता है। मूर्ति निर्माता गणेश प्रसाद का कहना है कि पहले 500 रूपया में एक ट्राली मिट्टी मिलता था, जो बढ़कर 15 सौ रूपया हो गया है। वर्तमान में मिट्टी से बने बर्तनों में दिया की कीमत 60 से 80 रूपये दर्जन, दियरी 3 से 4 सौ रूपया सैकड़ा, खिलौना 60 रूपया सेट चहीं पांच महल्ला सेट जो काफी पंसद किया जाता है 40 रूपया पीस हो गया है। मंहगाई बढ़ने से इसकी बिक्री पर असर नहीं पड़ा है। इसका असर आर्टिफिसीयल कागज से बने खिलौने, दीये ने उन पर काफी प्रभाव डाला है। इनका खिलौना बनाने के लिए चाक का प्रयोग किया जाता है। पहले उस चाक को चलाने के लिए लकड़ी का उपयोग किया जाता था, अब मोटर से चलाया जाता है। ऐसे में बर्तन बनाने में समय कम लगता है।