कोरोना के बाद बदली गांवों की तस्वीर, आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे युवा
कोरोना महामारी ने जहां एक ओर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुंचाया था, वहीं अब इसके प्रभाव से गांवों में एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। लॉकडाउन के दौरान शहरों से लौटे प्रवासी मजदूरों और युवाओं ने निराश होने के बजाय अपने ही गांव में रोजगार के नए अवसर तलाशे हैं। परिणामस्वरूप, प्रखंड के कई गांवों में अब स्वरोजगार और छोटे उद्योगों की एक नई लहर दिखाई दे रही है।
-- लॉक डाउन के दौरान गांव लौटे प्रवासी श्रमिकों ने तलाशे है रोजगार के नये अवसर, बन रहे है नजीर
पीके बादल/केसठ।
कोरोना महामारी ने जहां एक ओर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुंचाया था, वहीं अब इसके प्रभाव से गांवों में एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। लॉकडाउन के दौरान शहरों से लौटे प्रवासी मजदूरों और युवाओं ने निराश होने के बजाय अपने ही गांव में रोजगार के नए अवसर तलाशे हैं। परिणामस्वरूप, प्रखंड के कई गांवों में अब स्वरोजगार और छोटे उद्योगों की एक नई लहर दिखाई दे रही है।पहले जहां छोटी-छोटी जरूरतों के लिए लोगों को बाजार का रुख करना पड़ता था, वहीं अब गांवों में ही जनरल स्टोर, रेडीमेड कपड़ों की दुकानें, मोबाइल रिपेयरिंग, इलॉट्रानिक रिपेयरिंग सेंटर और अन्य व्यवसाय तेजी से खुल रहे हैं।

कई युवाओं ने मत्स्य पालन, मुर्गी पालन और मशरूम उत्पादन जैसे क्षेत्रों में कदम रखकर न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा किए हैं।हालांकि, यह बदलाव चुनौतियों से अछूता नहीं है। स्वरोजगार शुरू करने के लिए पूंजी की कमी आज भी बड़ी बाधा बनी हुई है। कई युवाओं को बैंक से ऋण लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, सीमित स्थानीय बाजार और बड़े शहरों से आने वाले सस्ते उत्पादों के कारण प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है। कुछ मामलों में कम बिक्री और बढ़ती उधारी के कारण युवा फिर से बाहर रोजगार की तलाश में जाने को मजबूर हो रहे हैं।

केसठ गांव के युवा रमेश कुमार, जिन्होंने लॉकडाउन के बाद किराना दुकान शुरू की, बताते हैं कि शहर में काम छूटने के बाद उन्होंने गांव में ही नई शुरुआत की। हालांकि आय कम है, लेकिन परिवार के साथ रहने का संतोष अधिक है। वहीं, नीतू कुमारी जैसी महिला उद्यमी गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही हैं। उन्होंने सिलाई केंद्र खोलकर कई महिलाओं को रोजगार से जोड़ा है। रमेश और नीतू जैसे कई अन्य युवा भी है जो पैनिक काल में गांव लौटे और स्वरोजगार की सीढ़ी चढ़ दूसरों के लिए नजीर बन गए है।स्थानीय जनप्रतिनिधियों का भी मानना है कि यदि सरकार की योजनाओं का लाभ समय पर इन छोटे उद्यमियों तक पहुंचे, तो गांवों से पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता है।

पंचायत स्तर पर भी प्रयास किए जा रहे हैं कि अधिक से अधिक लोगों को स्वरोजगार से जोड़ा जाए।विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भविष्य में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा। गांवों में ही रोजगार के अवसर बढ़ने से स्थानीय बाजार सशक्त होंगे और डिजिटल भुगतान व ऑनलाइन मार्केटिंग के जरिए ग्रामीण युवा तकनीकी रूप से भी आगे बढ़ेंगे।कोरोना संकट ने भले ही गांवों को कठिन दौर से गुजरने पर मजबूर किया, लेकिन इसी संकट ने आत्मनिर्भरता की नई राह भी दिखाई है। आज गांवों में उभर रहे छोटे-छोटे व्यवसाय आने वाले समय में बड़े उद्योगों का रूप ले सकते हैं, बशर्ते उन्हें उचित मार्गदर्शन और सरकारी सहयोग मिलता रहे।

इसके साथ ही गांवों में जीविका समूहों से जुड़कर महिलाएं भी तेजी से आत्मनिर्भर बन रही हैं। एक परिवार की महिला यदि जीविका समूह से जुड़ी होती है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे घर पर दिखाई देता है। महिलाएं समूह के माध्यम से बचत, ऋण और छोटे-छोटे व्यवसाय जैसे सिलाई, पशुपालन, किराना या खाद्य प्रसंस्करण शुरू कर रही हैं। खास बात यह है कि अब कई परिवारों में पति-पत्नी दोनों मिलकर रोजगार कर रहे हैं, जिससे आय के स्रोत बढ़े हैं और आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है। पहले जहां महिलाएं केवल घरेलू कार्यों तक सीमित थीं, वहीं अब वे परिवार की आय में बराबर की भागीदार बनकर आत्मसम्मान और सशक्तिकरण की नई मिसाल पेश कर रही हैं।

