चेंजर जला, सिस्टम फेल: 48 घंटे बाद भी नहीं सुधरी अस्पताल की बिजली व्यवस्था
डुमरांव अनुमंडल अस्पताल में बिजली व्यवस्था की एक बड़ी खामी ने सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल का मुख्य चेंजर जलने के 48 घंटे बाद भी उसे बदला नहीं जा सका है, जबकि इसी खराबी के कारण नवजात शिशुओं का इलाज वार्ड के बाहर करना पड़ा और एक प्रसूता को फर्श पर लेटकर इलाज कराना पड़ा।

__ कागजी प्रक्रिया में उलझा चेंजर बदलने का काम, मरीजों की जान पर बना हुआ है खतरा
केटी न्यूज/डुमरांव
डुमरांव अनुमंडल अस्पताल में बिजली व्यवस्था की एक बड़ी खामी ने सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल का मुख्य चेंजर जलने के 48 घंटे बाद भी उसे बदला नहीं जा सका है, जबकि इसी खराबी के कारण नवजात शिशुओं का इलाज वार्ड के बाहर करना पड़ा और एक प्रसूता को फर्श पर लेटकर इलाज कराना पड़ा। इसके बावजूद व्यवस्था सुधारने की प्रक्रिया अब भी फाइलों और कागजी औपचारिकताओं में उलझी हुई है।अस्पताल में बिजली आपूर्ति पूरी तरह एक ही चेंजर पर निर्भर है। उसके खराब होते ही लेबर वार्ड, एमएनसीयू समेत कई महत्वपूर्ण इकाइयों की बिजली व्यवस्था प्रभावित हो गई। अस्पताल प्रबंधन ने तकनीकी खराबी की सूचना पहले ही स्वास्थ्य विभाग को दे दी थी, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं हो सका है।

सोमवार को स्थिति तब गंभीर हो गई जब प्रसव के बाद दो नवजातों को एमएनसीयू में भर्ती किया गया। वहां बिजली नहीं होने के कारण डॉक्टरों को मशीनें वार्ड से बाहर निकालकर गेट पर ही उपचार शुरू करना पड़ा। इसी दौरान एक नवजात की हालत बिगड़ गई। प्रभारी उपाधीक्षक डॉ. प्रेमा कुमारी ने मौके पर पहुंचकर सीपीआर दिया, जिससे उसकी जान बच सकी। बाद में दोनों नवजातों को बेहतर इलाज के लिए बक्सर रेफर किया गया। जुड़वा बच्चों की मां की हालत भी बिगड़ी, लेकिन बिजली संकट के कारण उसे मदर वार्ड के बजाय एमएनसीयू के फर्श पर लेटना पड़ा।इस पूरे मामले ने अस्पताल प्रशासन की सीमाओं को भी उजागर कर दिया है। अनुमंडल अस्पताल का वित्तीय प्रभार सिविल सर्जन के पास है, जबकि प्रभारी उपाधीक्षक के पास केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी है। नतीजा यह है कि किसी तकनीकी उपकरण की मरम्मत या खरीद के लिए भी जिला स्तर की मंजूरी और लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

जानकारी के अनुसार चेंजर बदलने के लिए पहले कोटेशन तैयार होगा, फिर क्रय समिति की बैठक होगी, उसके बाद वर्क ऑर्डर जारी किया जाएगा। तब जाकर नया चेंजर खरीदा जा सकेगा। ऐसे में अस्पताल की बिजली व्यवस्था फिलहाल जुगाड़ के सहारे चल रही है। मिस्त्री की मदद से चेंजर को बाइपास कर अस्थायी बिजली आपूर्ति बहाल की गई है।अस्पताल के जानकारों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य विभाग के वरीय अधिकारी चाहें तो आपात स्थिति को देखते हुए तत्काल चेंजर बदलवाया जा सकता है और बाद में कागजी प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। लेकिन फिलहाल मरीजों की सुरक्षा से अधिक प्राथमिकता फाइलों की गति को मिलती दिख रही है। यही कारण है कि जीवन रक्षक सेवाओं वाले अस्पताल में भी बिजली व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही है।

