आईसीयू बना एमएनसीयू का गेट, पीपल की छांव में चला नवजात का इलाज
75 बेड वाले डुमरांव अनुमंडलीय अस्पताल में सोमवार को स्वास्थ्य व्यवस्था की ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने सरकारी दावों की पोल खोलकर रख दी। अस्पताल में नवजात शिशुओं के लिए अत्याधुनिक एमएनसीयू वार्ड और आईसीयू जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन बिजली व्यवस्था ध्वस्त होने के कारण एक गंभीर रूप से बीमार नवजात का इलाज वार्ड के भीतर नहीं बल्कि उसके गेट पर करना पड़ा।


__ तीन दिन से ट्रांसफार्मर में तकनीकी खराबी, जला पड़ा है चेंजर; खाली बेड देखते रही प्रसूता, परिजन हाथ से झलते रहे पंखा, सीएस ने दिए जांच के आदेश
केटी न्यूज/डुमरांव
75 बेड वाले डुमरांव अनुमंडलीय अस्पताल में सोमवार को स्वास्थ्य व्यवस्था की ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने सरकारी दावों की पोल खोलकर रख दी। अस्पताल में नवजात शिशुओं के लिए अत्याधुनिक एमएनसीयू वार्ड और आईसीयू जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन बिजली व्यवस्था ध्वस्त होने के कारण एक गंभीर रूप से बीमार नवजात का इलाज वार्ड के भीतर नहीं बल्कि उसके गेट पर करना पड़ा। संयोग यह रहा कि एमएनसीयू के ठीक सामने खड़ा विशाल पीपल का पेड़ उस समय डॉक्टर और नवजात दोनों के लिए प्राकृतिक राहत केंद्र बन गया। उसकी घनी छांव ने भीषण गर्मी और लू से बचाव किया, जबकि परिजन हाथ से पंखा झलकर मरीजों को राहत पहुंचाने की कोशिश करते रहे।

जानकारी के अनुसार अस्पताल को बिजली आपूर्ति करने वाले ट्रांसफार्मर में तीन दिन पहले आई तकनीकी खराबी के कारण आपूर्ति बाधित थी। स्थिति और गंभीर इसलिए हो गई क्योंकि अस्पताल का चेंजर लगभग एक महीने से जला पड़ा है तथा कई एमसीबी भी खराब हैं। ऐसे में जेनरेटर चलने के बावजूद अस्पताल के कई हिस्सों में बिजली नहीं पहुंच पा रही थी।सोमवार को नया भोजपुर थाना क्षेत्र के नोनिया डेरा निवासी ज्योति देवी ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। जन्म के बाद एक नवजात मां का दूध पीते समय गंभीर रूप से बीमार हो गया। बताया जाता है कि दूध उसके फेफड़े में चला गया था, जिससे सांस लेने में परेशानी होने लगी। परिजन आनन-फानन में बच्चे को डुमरांव अनुमंडलीय अस्पताल लेकर पहुंचे।

अस्पताल में भर्ती के बाद चिकित्सकों ने बच्चे को एमएनसीयू में रखने का प्रयास किया, लेकिन बिजली नहीं रहने से वार्ड में भीषण गर्मी थी और आवश्यक उपकरण भी सुचारू रूप से काम नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक कुमार ने समय गंवाना उचित नहीं समझा और एमएनसीयू के गेट पर ही बच्चे का इलाज शुरू कर दिया। गेट के सामने मौजूद पीपल के पेड़ की छांव में ऑक्सीजन सहायता और अन्य चिकित्सकीय प्रक्रिया शुरू की गई।प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उस समय का दृश्य बेहद मार्मिक था। एक तरफ गंभीर रूप से बीमार नवजात का इलाज चल रहा था, दूसरी ओर उसकी मां वार्ड के फर्श पर बेसुध पड़ी थी। वार्ड में उमस और गर्मी इतनी अधिक थी कि मरीजों और उनके परिजनों का ठहरना मुश्किल हो रहा था। कई परिजन हाथ से पंखा झलते नजर आए ताकि मरीजों को थोड़ी राहत मिल सके।

इसी दौरान अरियांव निवासी प्रिया देवी के नवजात की हालत भी बिगड़ गई। उसे हाइपोग्लाइसीमिया की शिकायत थी। डॉक्टर अभिषेक ने सीमित संसाधनों के बीच उसका भी उपचार किया और दोनों नवजातों की जान बचाने में सफलता हासिल की। बाद में एक बच्चे की स्थिति स्थिर होने पर उसे बेहतर इलाज के लिए हायर सेंटर रेफर कर दिया गया।मौके पर मौजूद सामाजिक कार्यकर्ता हरेकृष्ण यादव ने पूरी घटना का वीडियो बनाया और इसकी सूचना तत्काल सिविल सर्जन डॉ. शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती को दी। वीडियो सामने आते ही स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में निजी बिजली मिस्त्री बुलाकर जले हुए चेंजर को बाइपास किया गया और बिजली आपूर्ति बहाल करने का प्रयास किया गया। हालांकि तब तक नवजात का प्राथमिक उपचार एमएनसीयू गेट पर ही हो चुका था।

अस्पताल प्रबंधक मो. अफरोज आलम ने बताया कि 22 मई को ही जले हुए चेंजर और अन्य खराब उपकरणों की जानकारी फाइल के माध्यम से सिविल सर्जन कार्यालय को भेज दी गई थी। इसके बावजूद अब तक आवश्यक मरम्मत या प्रतिस्थापन नहीं कराया गया।सामाजिक कार्यकर्ता हरेकृष्ण यादव ने कहा कि यह केवल तकनीकी खराबी नहीं बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर विफलता है। उन्होंने कहा कि मामले में जिसकी भी लापरवाही सामने आए, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। इसकी जानकारी जिला प्रशासन और राज्य स्तर तक भी पहुंचाई जाएगी।

उधर सिविल सर्जन डॉ. शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती ने बताया कि बिजली संकट के बीच एमएनसीयू गेट पर नवजात के इलाज की सूचना मिली है। पूरे मामले की जांच के लिए समिति गठित कर दी गई है तथा संबंधित अधिकारियों और कर्मियों से स्पष्टीकरण मांगा गया है। जांच में दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।सरकारी अस्पताल की इस तस्वीर ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि जब आईसीयू और एमएनसीयू जैसे वार्ड मौजूद हों, तब भी यदि इलाज पेड़ की छांव और परिजनों के हाथ वाले पंखे के सहारे करना पड़े, तो स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक हालत आखिर क्या है।
