‘देहाती दुनिया’ ने हिन्दी साहित्य को दी आंचलिकता की नई जमीन

महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय के मानस सभागार में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में आचार्य शिवपूजन सहाय की कालजयी कृति ‘देहाती दुनिया’ के साहित्यिक, सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व पर गंभीर विमर्श हुआ।

‘देहाती दुनिया’ ने हिन्दी साहित्य को दी आंचलिकता की नई जमीन

__ शिवपूजन सहाय की रचना के वस्तुनिष्ठ पुनर्मूल्यांकन का आह्वान, एमवी कॉलेज में विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने साझा किए विचार

केटी न्यूज/बक्सर।

महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय के मानस सभागार में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में आचार्य शिवपूजन सहाय की कालजयी कृति ‘देहाती दुनिया’ के साहित्यिक, सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व पर गंभीर विमर्श हुआ। महाविद्यालय परिवार एवं ‘स्त्री दर्पण’, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित आचार्य शिवपूजन सहाय स्मृति पर्व समारोह सह राष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि ‘देहाती दुनिया’ महज ग्रामीण जीवन की कथा नहीं, बल्कि अपने दौर के समाज, संस्कृति और विसंगतियों का जीवंत दस्तावेज है।विषय-विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. मृत्युंजय सिंह ने कहा कि साहित्य में भाषा को समृद्ध करने के लिए गद्य का विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है और शिवपूजन सहाय के लेखन में इसकी स्पष्ट झलक मिलती है।

उन्होंने बताया कि 1921-22 में रची गई ‘देहाती दुनिया’ का प्रकाशन 1926 में हुआ।उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास ग्रंथ में शिवपूजन सहाय को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाने को दुखद बताते हुए कहा कि ‘मैला आँचल’ से करीब तीन दशक पहले ‘देहाती दुनिया’ का आना हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण बदलाव था। उन्होंने नई पीढ़ी से सहाय की रचनाओं को फिर से पढ़कर उनका वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करने का आह्वान किया।मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि विमल कुमार ने कहा कि ‘देहाती दुनिया’ को हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास मानने के पर्याप्त आधार हैं। उन्होंने कृति के विभिन्न अध्यायों, आलोचकीय दृष्टिकोणों और सहाय के जीवन से जुड़े कई अनछुए प्रसंगों पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि सहाय जी ने राष्ट्रहित और हिंदी सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाया। ‘देहाती दुनिया’ को फणीश्वरनाथ रेणु की ‘मैला आँचल’ के साथ रखकर देखने पर औपनिवेशिक दौर से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक के ग्रामीण भारत की व्यापक तस्वीर सामने आती है।अध्यक्षता करते हुए प्रो. डॉ. कृष्णा कांत सिंह ने कहा कि साहित्य शब्दों का शिल्प भर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का विस्तार है। साहित्य ‘मैं’ से ‘हम’ तक की यात्रा है। विशिष्ट अतिथि सहाय जी की प्रपौत्री लक्ष्मी सहाय ने उनके पारिवारिक जीवन से जुड़े दुर्लभ प्रसंग साझा किए और बताया कि उनकी स्मृतियां व पांडुलिपियां माइक्रोफिल्म के रूप में सुरक्षित हैं।

प्रो. रवींद्रनाथ राय ने प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, शिवपूजन सहाय और भिखारी ठाकुर की साहित्यिक परंपरा को सामाजिक बदलाव का माध्यम बताया। विद्यार्थियों विकास कुमार व अभिषेक कुमार ने भी विचार रखे। मंचासीन जितेंद्र कुमार ने संगोष्ठी को संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. पंकज कुमार चौधरी ने किया, जबकि डॉ. श्वेत प्रकाश ने धन्यवाद ज्ञापित किया। मौके पर प्राध्यापक, शोधार्थी और सैकड़ों छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। कार्यक्रम में ‘देहाती दुनिया’ के शताब्दी वर्ष पर विशेष पुस्तिका का विमोचन भी किया गया।