डुमरांव अस्पताल में ‘पोषण किट वितरण में बड़े घोटाले की आशंका
डुमरांव अनुमंडलीय अस्पताल में जच्चा-बच्चा पोषण किट वितरण योजना अब बड़े घोटाले के शक के घेरे में आ गई है। अस्पताल प्रशासन ने रिकॉर्ड में 533 प्रसूताओं के बीच लाखों रुपये मूल्य की पोषण किट बांटने का दावा किया है, लेकिन जमीनी पड़ताल में यह दावा खोखला नजर आने लगा है। कई लाभुकों और उनके परिजनों ने साफ कहा है कि उन्हें किसी प्रकार की पोषण किट कभी मिली ही नहीं।


__ कागज पर 533 जच्चा-बच्चा किट बांटने का दावा, केशव टाइम्स की पड़ताल में चार लाभुक बोले— “हमें तो कुछ मिला ही नहीं”, आरटीआई के जवाब और अस्पताल की सफाई ने बढ़ाए घोटाले के शक
केटी न्यूज/डुमरांव
डुमरांव अनुमंडलीय अस्पताल में जच्चा-बच्चा पोषण किट वितरण योजना अब बड़े घोटाले के शक के घेरे में आ गई है। अस्पताल प्रशासन ने रिकॉर्ड में 533 प्रसूताओं के बीच लाखों रुपये मूल्य की पोषण किट बांटने का दावा किया है, लेकिन जमीनी पड़ताल में यह दावा खोखला नजर आने लगा है। कई लाभुकों और उनके परिजनों ने साफ कहा है कि उन्हें किसी प्रकार की पोषण किट कभी मिली ही नहीं। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकारी रिकॉर्ड में बांटी गईं ये सैकड़ों किट गईं कहां?मामले का खुलासा तब हुआ जब सामाजिक कार्यकर्ता हरेकृष्ण सिंह यादव ने सूचना के अधिकार के तहत अस्पताल से पोषण किट वितरण का पूरा ब्योरा मांगा। जवाब में जो दस्तावेज सामने आए, उन्होंने पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए।

अस्पताल की ग्रेड-ए नर्स सह लेबर इंचार्ज उमा कुमारी ने लिखित जवाब में स्वीकार किया कि किट वितरण का कोई फोटो, वीडियो या ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। इतना ही नहीं, उन्होंने इसे “पहली गलती” बताते हुए माफी भी मांगी है।अस्पताल रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2025 में तीन चरणों में कुल 533 पोषण किट अस्पताल को प्राप्त हुई थीं। इनमें 13 जून को 153, 1 अगस्त को 190 और 15 अक्टूबर को 190 किट मिलने की बात दर्ज है। प्रत्येक किट की कीमत लगभग 1500 से 2000 रुपये बताई गई है। यानी पूरे मामले में लाखों रुपये के सरकारी खर्च का हिसाब जुड़ा हुआ है।रिकॉर्ड में यह भी दर्शाया गया है कि अलग-अलग तारीखों में सभी 533 किट लाभुकों के बीच वितरित कर दी गईं। लेकिन जब मीडिया द्वारा सूची में शामिल कई लाभुकों से संपर्क किया गया, तो कहानी पूरी तरह बदल गई।

कृष्णाब्रह्म निवासी खुशबू कुमारी के पति दीपक नट ने साफ कहा कि उनकी पत्नी की डिलीवरी अस्पताल में हुई थी, लेकिन उन्हें किसी पोषण किट की जानकारी तक नहीं है। रावलडेरा निवासी प्रियंका के पति मुकेश यादव, जो सेना में कार्यरत हैं, उन्होंने भी अस्पताल के दावे को खारिज करते हुए कहा कि प्रसव के दौरान कोई किट नहीं दी गई।नन्दन गांव की दुली कुमारी और गीता कुमारी के परिजनों ने भी यही बात दोहराई। उनका कहना था कि अस्पताल में सामान्य भोजन जरूर मिला, लेकिन पोषण किट जैसी कोई सुविधा नहीं दी गई। ऐसे कई लाभुकों के बयान अब अस्पताल प्रशासन की दलीलों पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वास्तव में 533 किट वितरित हुई थीं, तो उसका प्रमाण कहां है? अस्पताल के पास न लाभुकों के हस्ताक्षरयुक्त रसीद हैं, न वितरण के फोटो और न कोई डिजिटल रिकॉर्ड।

ऐसे में सरकारी योजना की पारदर्शिता पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गई है।मामले को और गंभीर तब माना जा रहा है जब लेबर इंचार्ज की ओर से यह तर्क दिया गया कि “संभव है लाभुक या उनके परिजन झूठ बोल रहे हों।” इस बयान ने पूरे विवाद को और भड़का दिया है। लोगों का सवाल है कि जब अस्पताल के पास खुद कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है, तो फिर लाभुकों को ही कटघरे में क्यों खड़ा किया जा रहा है?हालांकि अस्पताल प्रबंधन ने कुछ लाभुकों को किट देने की तस्वीरें मीडिया को उपलब्ध कराई थीं, लेकिन अब आशंका जताई जा रही है कि सीमित संख्या में वितरण दिखाकर कागजों पर बड़े पैमाने पर खेल किया गया।यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो यह केवल अनियमितता नहीं बल्कि सरकारी राशि के दुरुपयोग का गंभीर मामला बन सकता है।

अब निगाहें स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं। यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होती है, तो यह तय हो सकेगा कि वास्तव में कितनी माताओं तक पोषण किट पहुंची और कितनों के नाम सिर्फ सरकारी फाइलों में इस्तेमाल कर लिए गए।जानकारों का कहना है कि यदि गहराई से जांच की जाए तो इस योजना में बड़े घोटाले से इनकार नहीं किया जा सकता है। वही इस संबंध में बक्सर के सिविल सर्जन शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है यदि इस संबंध में शिकायत की गई तो मामले की जांच करवा दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
