खास होती है डुमरांव की महाशिवरात्रि, प्राचीन पांच शिवालय बढ़ा देते हैं महत्व
सिद्धाश्रम अर्थात बक्सर। धर्म की नगरी, जिसे बिहार का काशी कहा जाता है। कार्शी अर्थात शिव की नगरी। यह पूरा जिला अति प्राचीन शिव मंदिरों के लिए जगत विख्यात है। अनुमंडल के प्रमुख मंदिरों में पांच शिवमंदिर डुमरांव में हैं। जो यहां की महता को बढ़ा देते हैं। इनमें सबसे प्रमुख व प्रसिद्ध मंदिर ब्रह्मपुर स्थित ब्रह्मेश्वरनाथ मंदिर है। इसके अलावा महरौरा का शिव मंदिर, कचईनिया गांव में कंचनेश्वर महादेव मंदिर, डुमरांव में जंगलीनाथ बाबा का शिव मंदिर व मुंगांव गांव के मंुगेश्वर बाबा प्रमुख हैं। महरौरा व कचइनिया शिवमंदिर में शिवरात्रि के दिन विशेष मेला लगता है।
-- ब्रह्मपुर में सृष्टि के रचइतिा ब्रह्मा जी ने किया था ब्रह्मेश्वर नाथ की स्थापना,
-- डुमरांव, महरौरा व मुगांव में खुदाई के दौरान मिला शिवलिंग भक्तों में है आस्था
-- प्रशासन की तैयारी पुरी कड़ी सुरक्षा के बीच भक्त करेगें जलाभिषेक
- 58 महरौरा का शिवमंदिर
केटी न्यूज/डुमरांव।
सिद्धाश्रम अर्थात बक्सर। धर्म की नगरी, जिसे बिहार का काशी कहा जाता है। कार्शी अर्थात शिव की नगरी। यह पूरा जिला अति प्राचीन शिव मंदिरों के लिए जगत विख्यात है। अनुमंडल के प्रमुख मंदिरों में पांच शिवमंदिर डुमरांव में हैं। जो यहां की महता को बढ़ा देते हैं। इनमें सबसे प्रमुख व प्रसिद्ध मंदिर ब्रह्मपुर स्थित ब्रह्मेश्वरनाथ मंदिर है। इसके अलावा महरौरा का शिव मंदिर, कचईनिया गांव में कंचनेश्वर महादेव मंदिर, डुमरांव में जंगलीनाथ बाबा का शिव मंदिर व मुंगांव गांव के मंुगेश्वर बाबा प्रमुख हैं। महरौरा व कचइनिया शिवमंदिर में शिवरात्रि के दिन विशेष मेला लगता है।

-- ब्रह्मा जी ने स्वयं की थी ब्रह्मेश्वर नाथ की स्थापना, मुगल शासक भी नही तोड़ पाए थे मंदिर
बाबा ब्रह्मेश्वर नाथ मंदिर प्रबंधन के अध्यक्ष शिव गोपाल पाण्डेय व उपाध्यक्ष डमरू पाण्डेय ने बताया शिवलिंग आपरूपी माना गया है। जिसका व्यख्या शास्त्रों व इतिहास में दर्ज है। मान्यता के अनुसार ब्रह्माजी ने स्वंय यहां पर भगवान भोले नाथ की पूजा अर्चना की थी जिससे भोले नाथ प्रसन्न हो प्रगट हुए थे। उसके बाद ब्रह्माजी ने गांव का निर्माण किया इसलिए इसका नाम ब्रह्मपुर है। मुगलकाल के मध्य में जब मंदिर तोड़ी जा रही थी। उसी दौरान जौनपुर का सुबेदार कासीम अली खां बाबा ब्रह्मेश्वर नाथ मंदिर पहुंचा। परन्तु बाबा के प्रभाव के बारे में मंदिर के पुजारियो ने बताया कि तो कासीम ने 24 घंटे का समय दिया कि अगर मंदिर का दरवाजा पुरब से पश्चिम हो जायेगा तो छोड़ देंगे।

उसने मंदिर के चारों तरफ सेना का कडाी पहरा भी लगा दिया था। लेकिन सुबह में उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि रातों-रात मंदिर का गेट पश्चिम दिशा में हो गया था। इसके बाद कासीम इसे बाबा का चमत्कार मान छोड़ कर चला गया। वास्तुशास्त्र के अनुसार मंदिर का मुख्य गेट पश्चिम की तरफ नहीं होता है। परन्तु ब्रह्मपुर शिवमंदिर का मुख्य दरवाजा आज भी पश्चिम दिशा में ही है। बाबा ब्रह्मेश्वरनाथ मंदिर में यूपी-बिहार के विभिन्न हिस्सो से जलाभिषेक करने के लिए लाखों श्राद्धालु आते है। आधी रात से मंदिर के प्रवेश द्वार दर्शनार्थियों के लिए खोल दिए जाते है। श्रद्धालु ब्रह्म सरोवर में स्नान कर बाबा को जल चढ़ाते है।

-- जंगलीनाथ के नाम मात्र से भक्तों का होता है दुखों का नाश
जीवन की जटिलताएं जब इंसान को परेशान कर देती हैं और संकटों से उबरने का कोई उपाय नहीं सूझता, तो हताश लोगों के कदम अनायास ही जंगलीनाथ महादेव मंदिर की ओर चल पड़ते हैं। ऐसी मान्यता है कि मंदिर में सच्चे मन से आराधना करने वाले भक्तों व दीन-दुखियों का बाबा दुख दूर करते हैं। मंदिर में आज भी सुबह से शाम तक भक्तों के आने जाने का क्रम चलता रहता है। भक्त राम अवतार सिंह बताते हैं कि वर्षों पहले यह इलाका घना जंगल था। उस वक्त संत दानी बाबा जंगल में भगवान की आराधना करते थे। भगवान शिव ने संत को शिवलिंग होने का स्वप्न दिए। शिवलिंग की स्थापना कर पूजा पाठ शुरू हो गया। घने जंगल के बीच शिवलिंग होने के कारण इन्हें जंगली महादेव के रुप में प्रसिद्धि मिली।

कहा जाता है कि दानी बाबा हर दिन सौ गायों के दूध से शिवलिंग का अभिषेक करते थे। उनके निधन के बाद डुमरांव राज परिवार ने मंदिर के लिए चार बीघा जमीन देकर मंदिर निर्माण का कार्य शुरू कराया था। लेकिन निर्माण के दौरान बाधाएं आने लगी। अंत में निर्माण कार्य रोकना पड़ा था। पुराने लोगों का कहना है कि उस वक्त भगवान शिव ने महाराज को स्वप्न दिया कि मेरे इजाजत के बगैर कोई काम नहीं हो सकता। हुआ ऐसा ही, निर्माण कार्य बंद कर भगवान शिव की आराधना शुरू हुई। जब भगवान शिव की इजाजत मिली, तो डुमरांव राज परिवार ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया।

-- दो सौ वर्ष पूर्व खुदाई में मिला था महरौरा का शिवलिंग, हल्दी के लेप से होती है मनोकामना पूरी
वैसे तो सावन के महीने में होती है भगवान भोलेनाथ की विशेष पूजा और पूजा मे भांग, धतूरा, वेल पत्र, शम्मी पत्र आदि की प्रधानता होती है। लेकिन डुमरांव से सटे व कुशलपुर पंचायत में अनोखे मान्यतावाले महरौरा के शिवमंदिर की परंपरा भी अलग है। यहा फाल्गुन महीने के महाशिवरात्रि के दिन भगवान भोलेनाथ की विशेष पूजा होती है तथा मनोकामना पूर्ण होने के लिए भक्त शिवलिंग पर हल्दी का लेप लगाते है। मान्यता है कि ऐसा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। मंदिर के पुजारी खेदू मिश्र ने बताया कि दो सौ साल पहले तक महरौरा घने जंगलों से घिरा था। एकबार यज्ञ के लिए जंगल में कुटिया निर्माण के लिए साधुओं द्वारा सफाई करवाई जा रही थी। सफाई के दौरान ही एक खेत में खुदाई के समय यह शिवलिंग मिला था।

जिसे मंदिर के स्थान पर रख पूजा शुरू हुआ। बाद में किसी ग्रामीण ने स्वप्न देखा कि भगवान शिव वहा मंदिर बनवाने को कह रहे है। इसके बाद ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर तथा विशाल तालाब का निर्माण कराया गया। मान्यता तो यह भी है कि इस तालाब में नहाने से चर्म रोग दूर होता है। आज भी तालाब का जल महादेव को अर्पित किया जाता है। फाल्गुन शिवरात्रि को महरौरा धाम में वार्षिक पूजा होती है तथा एक विशाल मेले का आयोजन भी किया जाता है। पंडित श्री मिश्र की मानें तो शिवलिंग पर हल्दी का लेप लगाने से भक्तों की मनोकामना पूरी होती है।
-- कांव नदी के रमणीक तट पर स्थित है कंचनेश्वर धाम
कांव नदी के रमणीक तट तथा कंचन वन में स्थित होने के कारण कचइनियां के प्राचीन ( बुढ़वा शिवमंदिर ) को कंचनेश्वरधाम के नाम से जाना जाता है। यहा करीब पांच सौ सालों से शिवलिंग स्वतः प्रकट हुआ था। लेकिन घने जंगल में होने के कारण कोई पूजा अर्चना करने नहीं जाता था। तब कलकल बहती कांव नदी की विशाल जलधारा खुद कंचनेश्वर के पाव पखारती थी। कहा जाता है कि 19 वीं शदी के अंतिम दशक में कचइनियां गांव में एक मौनिया बाबा आए थे। उन्होंने शिवलिंग में चमत्कारिक गुण देखा तथा प्रत्यक्ष महादेव के होने का अनुभव होने पर उन्होंने गांव वालों को शिवलिंग का महत्व समझाया तथा वहा मंदिर बनाने का सुझाव दिया। इसके बाद घने जंगलों के बीच कंचनेश्वर का विशाल मंदिर बनवाया गया।

इस जगह की महता इस कारण भी बढ़ जाती है। कि भू-दान आंदोलन के प्रणेता संत विनोवा भावे ने इसे अपना कर्मस्थली बनाया था तो धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज ने यहा आधा दर्जन से अधिक यज्ञ का आयोजन किया था। मंदिर परिसर में स्थित वेलवृक्ष के नीचे श्री प्राप्ति तथा मनोकामना सिद्धि के लिए साधक तपस्या भी करते है। कुछ साल पहले कंचनेश्वरधाम की महिमा से प्रभावित हो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी यहा पूजा अर्चना करने आए थे। हर साल फाल्गुन महीने के महाशिवरात्रि के दिन मंदिर का वार्षिक पूजा आयोजित किया जाता है। जिसमें अनुमंडल सहित जिलेभर व पड़ोसी जिला रोहतास से भी श्रद्धालु पहुंचते है। इस बार भी पूर्व संध्या पर मंदिर में अखंड कीर्तन शुरू हो गया है।

-- मूंग के आकृति के कारण नाम पड़ा मुंगेश्वरनाथ
अनुमंडल मुख्यालय से 8 किलोमीटर दूर स्थित मुंगाव का मुंगेश्वरधाम की छटा व मान्यता भी कम निराली नहीं है। यहा के शिवलिंग का आकार मूंग की तरह है। यही कारण है कि मंदिर का नाम मुंगेश्वरधाम पड़ा। मंदिर के पुजारी रामाशंकर दूबे ने बताया कि आज जहा मुंगेश्वरधाम का शिवमंदिर है वहा डेढ़ सौ साल पहले मूंग की आकृति का शिवलिंग अपने आप प्रकट हुआ था। ग्रामीणों ने जमीन के नीचे शिवलिंग देख उसे उपर करना चाहा। लेकिन जब ग्रामीण शिवलिंग की खुदाई करने लगे तो लिंग का आधार चौड़ा होेते गया तथा खुदाई करने में ग्रामीण सफल नहीं हुए। तब गड्ढें में ही लिंग को छोड़ वहा मंदिर बनवाया गया। यहा पूजा पाठ करने वालों की मनोकामना मुंगेश्वरनाथ पूरी करते है। हर साल महाशिवरात्रि पर यह मंदिर शिवभक्तों के आकर्षण का केन्द्र रहता है।
