मणियां गांव में बेटियों के यज्ञोपवीत से सशक्तिकरण की मिसाल, 45 वर्षों से टूट रही रूढ़ियां
आमतौर पर यज्ञोपवीत संस्कार को पुरुषों तक सीमित मानने वाली सामाजिक सोच के बीच नावानगर प्रखंड का मणियां गांव पिछले साढ़े चार दशकों से एक अलग और साहसिक संदेश दे रहा है। यहां बसंत पंचमी के पावन अवसर पर लड़कियों का जनेऊ धारण कराना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नारी सशक्तिकरण, समानता और वैदिक मूल्यों को जीवन में उतारने का जीवंत प्रयोग बन चुका है।
-- तीन दिवसीय सारस्वत यज्ञ की पूर्णाहुति के साथ छात्राओं ने वैदिक मंत्रों के बीच की जनेऊ धारण
वरूण कुमार/नावानगर
आमतौर पर यज्ञोपवीत संस्कार को पुरुषों तक सीमित मानने वाली सामाजिक सोच के बीच नावानगर प्रखंड का मणियां गांव पिछले साढ़े चार दशकों से एक अलग और साहसिक संदेश दे रहा है। यहां बसंत पंचमी के पावन अवसर पर लड़कियों का जनेऊ धारण कराना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नारी सशक्तिकरण, समानता और वैदिक मूल्यों को जीवन में उतारने का जीवंत प्रयोग बन चुका है। मणियां गांव स्थित दयानंद आर्य हाई स्कूल में आयोजित तीन दिवसीय सारस्वत यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद बसंत पंचमी को यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न हुआ।इस वर्ष सात छात्राओं ने वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच जनेऊ धारण कर श्रेष्ठ आचरण, अनुशासन और आदर्श जीवन का संकल्प लिया। हवन कुंड के समक्ष बैठी छात्राओं के साथ पूरा विद्यालय परिसर वैदिक ऋचाओं से गुंजायमान हो उठा।

इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी प्रकार का दबाव नहीं होता। विद्यालय में पढ़ने वाली छात्राएं स्वेच्छा से इस संस्कार को अपनाती हैं। जनेऊ धारण को यहां अधिकार, जिम्मेदारी और आत्मशुद्धि के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, न कि किसी जाति या लिंग विशेष से जोड़कर। यही कारण है कि इस आयोजन को गांव और आसपास के क्षेत्र में व्यापक सामाजिक समर्थन मिलता है।आचार्य हरिनारायण आर्य और सिद्धेश्वर शर्मा के आचार्यत्व में इस बार सोनाली कुमारी, अंशु कुमारी, चिंता कुमारी, पिंकी कुमारी, ममता कुमारी, निधि कुमारी और सीमा कुमारी सहित अन्य छात्राओं को वैदिक विधि से यज्ञोपवीत संस्कार कराया गया। आचार्यों ने छात्राओं को बताया कि जनेऊ केवल धागा नहीं, बल्कि संयम, सदाचार, सत्य और सेवा का जीवनभर का संकल्प है।

-- 1972 से चली आ रही अनोखी शुरुआत
इस अनोखी परंपरा की नींव वर्ष 1972 में मणियां उच्च विद्यालय के संस्थापक स्व. विश्वनाथ सिंह ने रखी थी। आर्य समाजी विचारधारा से प्रभावित स्व. सिंह ने सबसे पहले अपनी पुत्रियों को जनेऊ धारण कराकर समाज को यह संदेश दिया कि वैदिक संस्कारों पर पुरुषों का एकाधिकार नहीं है। उनका मानना था कि नारी शक्ति को सशक्त और संस्कारित बनाए बिना समाज का संतुलित विकास संभव नहीं है। तभी से यह परंपरा निरंतर चलती आ रही है।
-- समाज को दिशा देने वाली पहलः
गांव के वरिष्ठ ग्रामीणों का कहना है कि इस आयोजन ने बेटियों के प्रति सोच को बदला है। दीनानाथ सिंह, वकील सिंह और अन्य ग्रामीणों के अनुसार, इस संस्कार के बाद छात्राओं में आत्मविश्वास, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना और प्रबल होती है। यूं कहा जाए कि यहां समाज को दिशा देने वाली पहल की जा रही है।

-- मूर्तिपूजा नहीं, यज्ञ की परंपरा
मणियां गांव में मूर्तिपूजा का प्रचलन नहीं है। यहां शिक्षा और संस्कार के केंद्र में यज्ञ को रखा गया है। बसंत पंचमी को छात्र-छात्राएं यज्ञोपवीत के माध्यम से जीवन में श्रेष्ठ आचरण को अपनाने का संकल्प लेते हैं। आचार्य सिद्धेश्वर शर्मा का कहना है कि समाज में बेटियों का अपमान जहर के समान है और भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों को समझे बिना सच्चा महिला सशक्तिकरण संभव नहीं।मणियां गांव की यह परंपरा आज के दौर में एक मजबूत सामाजिक संदेश देती है, जहां बेटियां केवल अधिकार नहीं मांग रहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनने का संकल्प भी ले रही हैं।

