सांसद सहयोगी’ के नाम पर दबाव की सियासत: शिक्षा विभाग में पत्राचार से मचा हड़कंप
जिला शिक्षा कार्यालय बक्सर में इन दिनों एक नए विवाद ने प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। मामला ‘सांसद सहयोगी’ के नाम पर हो रहे कथित दबाव और आधिकारिक पत्राचार से जुड़ा है। आरोप है कि संवेदक के रूप में कार्य कर चुका एक व्यक्ति, जो अपने रिश्तेदारों के नाम पर भी विभागीय कार्यों से जुड़ा रहा है, सांसद सहयोगी की पहचान का उपयोग कर अधिकारियों पर प्रभाव बनाने की कोशिश कर रहा है।
-- आरटीआई में उठे सवाल क्या सांसद सहयोगी को है आधिकारिक पत्र जारी करने का अधिकार
केटी न्यूज/बक्सर।
जिला शिक्षा कार्यालय बक्सर में इन दिनों एक नए विवाद ने प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। मामला ‘सांसद सहयोगी’ के नाम पर हो रहे कथित दबाव और आधिकारिक पत्राचार से जुड़ा है। आरोप है कि संवेदक के रूप में कार्य कर चुका एक व्यक्ति, जो अपने रिश्तेदारों के नाम पर भी विभागीय कार्यों से जुड़ा रहा है, सांसद सहयोगी की पहचान का उपयोग कर अधिकारियों पर प्रभाव बनाने की कोशिश कर रहा है।सूत्रों के अनुसार संबंधित व्यक्ति द्वारा जिला से लेकर राज्य स्तर तक शिक्षा विभाग के अधिकारियों को सांसद सहयोगी के नाम से पत्र भेजे जा रहे हैं। इन पत्रों में विभिन्न मामलों में हस्तक्षेप और मनोनुकूल कार्रवाई का दबाव बनाए जाने की बात सामने आ रही है।

शिक्षा कार्यालय के भीतर चर्चा है कि इस तरह के पत्राचार का उद्देश्य विभागीय ठेकों और योजनाओं में प्रभाव कायम रखना हो सकता है।यह तथ्य भी सामने आया है कि स्थानीय सांसद ने शिक्षा विभाग के लिए औपचारिक रूप से एक सांसद सहयोगी का मनोनयन किया है और इसे अपने लेटर पैड पर जारी भी किया है। लेकिन विवाद इस बात को लेकर गहराया है कि क्या मनोनयन के बाद कोई सांसद सहयोगी स्वतंत्र रूप से विभागीय अधिकारियों को आधिकारिक पत्र जारी कर सकता है, क्या उसे प्रशासनिक हस्तक्षेप का अधिकार प्राप्त है।इसी संदर्भ में एक आरटीआई कार्यकर्ता ने संसदीय कार्य मंत्रालय से विस्तृत जानकारी मांगी है।

आरटीआई में यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया गया है कि सांसद सहयोगी की संवैधानिक या प्रशासनिक भूमिका क्या है, और क्या वह किसी विभाग पर आधिकारिक दबाव बना सकता है।सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि मध्याह्न भोजन और बेंच-डेस्क जैसी करोड़ों की योजनाओं से जुड़े कार्यों में संबंधित व्यक्ति की सक्रिय भूमिका रही है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।अब निगाहें आरटीआई के जवाब पर टिकी हैं। जवाब आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि सांसद सहयोगी की भूमिका महज समन्वय तक सीमित है या उसे प्रशासनिक पत्राचार का अधिकार भी प्राप्त है। फिलहाल शिक्षा विभाग में इस मुद्दे को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।

