पति के जाने का दर्द नहीं सह सकी पत्नी, तीन मासूम बच्चों को ट्रेन मे छोड़ लगा दी छलांग
कभी-कभी जिंदगी इतनी बेरहम हो जाती है कि इंसान के सारे हौसले, सारे त्याग और सारी उम्मीदें एक ही झटके में बिखर जाती हैं। इटाढ़ी थाना क्षेत्र के खखड़ही गांव से सामने आई यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और टूटते विश्वास की मार्मिक कहानी बन गई है। जहां पति के मौत के कुछ घंटो बाद ही पत्नी ने भी चलती ट्रेन से छलांग लगा जान दे दी है।
-- जिसने जीवन बचाने को दान कर दी किडनी, उसी ने कुछ घंटों बाद दुनिया से विदा ले ली
केटी न्यूज/बक्सर
कभी-कभी जिंदगी इतनी बेरहम हो जाती है कि इंसान के सारे हौसले, सारे त्याग और सारी उम्मीदें एक ही झटके में बिखर जाती हैं। इटाढ़ी थाना क्षेत्र के खखड़ही गांव से सामने आई यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और टूटते विश्वास की मार्मिक कहानी बन गई है। जहां पति के मौत के कुछ घंटो बाद ही पत्नी ने भी चलती ट्रेन से छलांग लगा जान दे दी है।खखड़ही गांव निवासी अजीत कुमार उपाध्याय उर्फ बबलू के निधन के कुछ ही घंटों बाद उनकी पत्नी नीतू भी इस दुनिया से चली गई।

उसका शव रेलवे ट्रैक के किनारे पड़ा था, जबकि उसके पति के शव को घरवाले एंबुलेंस से लेकर आ रहे थे। वहीं, नीतू अपने बच्चों तथा घर के अन्य सदस्यों के साथ ट्रेन से आ रही थी। माना जा रहा है कि उसने पति के निधन के दुख में ट्रेन से छलांग लगा दी होगी। पति के वियोग का सदमा वह सहन नहीं कर सकी। गुरुवार को जब बबलू ने लखनऊ में अंतिम सांस ली, उसी क्षण से नीतू जैसे भीतर से टूट चुकी थी। उसकी आंखें खामोश थीं, शब्द साथ छोड़ चुके थे।

-- पति के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया था
बबलू पावर प्लांट में कार्यरत थे। कुछ साल पहले बीमारी के चलते उनकी हालत बिगड़ने लगी। इलाज के दौरान जब डॉक्टरों ने किडनी प्रत्यारोपण की सलाह दी, तब नीतू ने बिना किसी हिचक के आगे बढ़कर अपनी एक किडनी दान कर दी। वह जानती थी कि यह रास्ता कठिन है, लेकिन पति का जीवन उसके लिए सबसे बड़ा था।ऑपरेशन सफल रहा, परिवार में उम्मीद की लौ जली, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कुछ समय बाद बबलू की तबीयत फिर बिगड़ी और गुरुवार को लखनऊ में उनका निधन हो गया।

-- तीन बच्चों की मां, टूट चुकी थी भीतर से
नीतू अपने पीछे तीन मासूम बच्चों को छोड़ गई, दो बेटियां और एक छोटा बेटा। पति के निधन के बाद वह पूरी तरह शांत थी। परिवार के लोग उसे संभालने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि वह भीतर ही भीतर कितना अकेली हो चुकी है।शुक्रवार की सुबह जब उसके निधन की पुष्टि हुई, तो पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। जिस महिला ने अपने पति के लिए जीवन का सबसे बड़ा त्याग किया, वही अब बच्चों की दुनिया से हमेशा के लिए दूर हो चुकी थी।

-- गांव और परिजनों में मातम
इस घटना से खखड़ही गांव में शोक की लहर है। हर आंख नम है, हर जुबान पर एक ही सवाल क्या त्याग और प्रेम का यही अंत होना था। नीतू और बबलू की कहानी अब गांव में एक ऐसी याद बन गई है, जिसे कोई भी भूल नहीं पाएगा।यह सिर्फ दो जिंदगियों के जाने की खबर नहीं, बल्कि उस दर्द की कहानी है, जिसे शब्दों में समेट पाना मुश्किल है।
