रामकथा में गूंजा धर्म और करुणा का संदेश, ताड़का वध से अहिल्या उद्धार तक भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

कोपवां गांव स्थित काली मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय श्रीराम कथा महोत्सव शुक्रवार को श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं के उत्कर्ष का साक्षी बना। कथा के पांचवें दिन भगवान श्रीराम के शौर्य, करुणा और धर्मपालन से जुड़े प्रसंगों का ऐसा भावपूर्ण वर्णन हुआ कि कथा पंडाल में मौजूद श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर देर शाम तक कथा श्रवण में तल्लीन रहे।

रामकथा में गूंजा धर्म और करुणा का संदेश, ताड़का वध से अहिल्या उद्धार तक भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

__ विश्वामित्र संग राम की यात्रा, यज्ञ रक्षा और मिथिला प्रस्थान के प्रसंगों ने बांधा समां; भजनों से देर शाम तक भक्तिमय रहा वातावरण

केटी न्यूज/डुमरांव

कोपवां गांव स्थित काली मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय श्रीराम कथा महोत्सव शुक्रवार को श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं के उत्कर्ष का साक्षी बना। कथा के पांचवें दिन भगवान श्रीराम के शौर्य, करुणा और धर्मपालन से जुड़े प्रसंगों का ऐसा भावपूर्ण वर्णन हुआ कि कथा पंडाल में मौजूद श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर देर शाम तक कथा श्रवण में तल्लीन रहे।राष्ट्रीय कथावाचक पंडित मधुसूदन बिहारी जी ने कहा कि श्रीराम का जीवन केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि मानवता के लिए आदर्श आचरण और मर्यादा का सर्वोच्च उदाहरण है।

उन्होंने बताया कि जब महर्षि विश्वामित्र ने अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को साथ ले जाने का आग्रह किया, तब दोनों भाइयों ने गुरु की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए धर्म रक्षा का संकल्प लिया।कथावाचक ने वन यात्रा के दौरान ताड़का और सुबाहु वध का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि यह केवल राक्षसों के संहार की कथा नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म और अन्याय पर न्याय की विजय का संदेश है। श्रीराम ने अपने पराक्रम से ऋषियों के यज्ञ की रक्षा कर समाज को यह प्रेरणा दी कि सत्य और धर्म की स्थापना के लिए साहस और संकल्प आवश्यक है।अहिल्या उद्धार के मार्मिक प्रसंग ने श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया। कथावाचक ने कहा कि प्रभु श्रीराम के चरण स्पर्श से अहिल्या को मुक्ति प्राप्त हुई, जो भगवान की असीम करुणा, दया और भक्तवत्सलता का प्रतीक है।

वहीं गंगा अवतरण की कथा के माध्यम से तप, त्याग और लोककल्याण की महत्ता पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया।कथा के अगले चरण में महर्षि विश्वामित्र के साथ श्रीराम और लक्ष्मण के मिथिला पहुंचने तथा राजा जनक द्वारा आयोजित धनुष यज्ञ और सीता स्वयंवर की तैयारियों का रोचक वर्णन किया गया। इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं में उत्साह और जिज्ञासा का संचार कर दिया।संगीतमय भजनों, मधुर प्रवचनों और जय श्रीराम के उद्घोष से पूरा कथा स्थल भक्तिरस में सराबोर रहा। श्रद्धालुओं ने कथा को आत्मिक शांति और जीवन मूल्यों से जोड़ने वाला प्रेरणादायी आयोजन बताया।