जेके सीमेंट पर सरकारी चेक डैम तोड़ने का आरोप, जल संकट से भड़का ग्रामीणों का आक्रोश

ब्रह्मपुर प्रखंड के कांट गांव स्थित जेके सीमेंट फैक्ट्री एक बार फिर विवादों में घिर गई है। फैक्ट्री प्रबंधन पर सरकारी चेक डैमों को तोड़ने, जल स्रोतों को नुकसान पहुंचाने और पर्यावरणीय संतुलन बिगाड़ने के गंभीर आरोप लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि फैक्ट्री ने सफाई अभियान के नाम पर दो महत्वपूर्ण जल संरचनाओं को ध्वस्त कर दिया, जिससे इलाके में सिंचाई और पेयजल संकट गहराने लगा है।

जेके सीमेंट पर सरकारी चेक डैम तोड़ने का आरोप, जल संकट से भड़का ग्रामीणों का आक्रोश

__ ब्रह्मपुर के कांट गांव में दो जल संरचनाएं ध्वस्त होने का दावा, लोक शिकायत में पहुंचा मामला; पुनर्निर्माण और कार्रवाई की मांग तेज

केटी न्यूज/ब्रह्मपुर :

ब्रह्मपुर प्रखंड के कांट गांव स्थित जेके सीमेंट फैक्ट्री एक बार फिर विवादों में घिर गई है। फैक्ट्री प्रबंधन पर सरकारी चेक डैमों को तोड़ने, जल स्रोतों को नुकसान पहुंचाने और पर्यावरणीय संतुलन बिगाड़ने के गंभीर आरोप लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि फैक्ट्री ने सफाई अभियान के नाम पर दो महत्वपूर्ण जल संरचनाओं को ध्वस्त कर दिया, जिससे इलाके में सिंचाई और पेयजल संकट गहराने लगा है।ग्रामीणों के अनुसार पहला चेक डैम भोजपुर और बक्सर जिले की सीमा पर बहने वाली नदी पर बना था, जिसे भोजपुर भूमि संरक्षण विभाग ने तैयार कराया था। यह डैम आसपास के सैकड़ों किसानों के लिए सिंचाई का प्रमुख साधन माना जाता था।

दूसरा चेक डैम बक्सर जिले की सीमा में स्थित था, जिससे खेती के अलावा पशुओं के लिए भी सालभर पानी उपलब्ध रहता था। दोनों संरचनाओं के टूटने से किसानों और पशुपालकों की परेशानी बढ़ गई है।स्थानीय लोगों का आरोप है कि फैक्ट्री प्रबंधन ने बिना प्रशासनिक अनुमति और बिना किसी तकनीकी स्वीकृति के जेसीबी मशीन लगाकर इन डैमों को हटाया। इससे न केवल सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा, बल्कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर भी असर पड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में अब जल संचयन की व्यवस्था कमजोर हो जाएगी, जिससे भूजल स्तर पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

इस पूरे मामले को लेकर पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता शैलेश ओझा ने एक माह पूर्व जिलाधिकारी को लिखित शिकायत सौंपी थी। आरोप है कि शिकायत के बावजूद अब तक न तो स्थल जांच कराई गई और न ही जिम्मेदार पक्ष के खिलाफ कोई प्रशासनिक कार्रवाई हुई। इससे स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।शैलेश ओझा ने कहा कि यदि औद्योगिक इकाइयों को सरकारी जल संरचनाएं तोड़ने की खुली छूट मिल जाएगी, तो आने वाले समय में किसानों की आजीविका और पर्यावरण दोनों पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण की सरकारी योजनाएं तभी सफल होंगी, जब ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई होगी।

प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई नहीं होने के बाद अब यह मामला लोक शिकायत निवारण में दर्ज कराया गया है। शिकायतकर्ताओं ने फैक्ट्री प्रबंधन पर प्राथमिकी दर्ज करने, दोनों चेक डैमों का पुनर्निर्माण कंपनी के खर्च पर कराने और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।अब इस प्रकरण पर जिलेभर की नजरें टिकी हैं। लोगों को उम्मीद है कि आगामी सुनवाई में प्रशासन स्थिति स्पष्ट करेगा और दोषियों पर कार्रवाई के साथ जल संरचनाओं को बचाने की दिशा में ठोस कदम उठाएगा।