जंगल की गोद से प्रकट हुईं मां भवानी, केसठ में सदियों पुरानी आस्था का प्रतीक है प्राचीन मंदिर

प्राचीन इतिहास, धार्मिक आस्था और लोकविश्वास की अनूठी विरासत को अपने भीतर समेटे केसठ का मां भवानी मंदिर आज भी क्षेत्र के लोगों की श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि मां भवानी के दरबार में सच्चे मन से माथा टेकने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

जंगल की गोद से प्रकट हुईं मां भवानी, केसठ में सदियों पुरानी आस्था का प्रतीक है प्राचीन मंदिर

__ चेरो-खरवार कालीन मानी जाती है मां की दुर्लभ पाषाण प्रतिमा, 1986 में ग्रामीणों ने खोजकर कराया था पुनर्स्थापित

__ हर पूर्णिमा पर 24 घंटे का अखंड हरि-कीर्तन, नवरात्रि में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब

केटी न्यूज/ पीके बादल/केसठ। 

प्राचीन इतिहास, धार्मिक आस्था और लोकविश्वास की अनूठी विरासत को अपने भीतर समेटे केसठ का मां भवानी मंदिर आज भी क्षेत्र के लोगों की श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि मां भवानी के दरबार में सच्चे मन से माथा टेकने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि सामान्य दिनों में भी मंदिर में श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, जबकि नवरात्रि और अन्य विशेष अवसरों पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर की प्राचीनता, दुर्लभ पाषाण प्रतिमा और इससे जुड़ी ऐतिहासिक मान्यताएं इसे क्षेत्र की विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान करती हैं।

__ जंगलों की गोद में छिपी थी प्राचीन प्रतिमा

स्थानीय जानकारों और ग्रामीणों के अनुसार, मंदिर में स्थापित मां भवानी की मूल प्रतिमा चेरो-खरवार काल की मानी जाती है। बताया जाता है कि यह प्राचीन पाषाण प्रतिमा लंबे समय तक घने जंगलों के बीच छिपी रही। वर्ष 1986 में ग्रामीणों के प्रयास से प्रतिमा को खोजा गया। इसके बाद श्रद्धा और विधि-विधान के साथ मंदिर का निर्माण कराकर मां भवानी की प्रतिमा को पुनः स्थापित किया गया। प्रतिमा की खोज से जुड़ी यह कहानी आज भी गांव के बुजुर्गों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती है।ग्रामीणों के लिए यह केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली आस्था और सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर है। मंदिर से जुड़ी मान्यताएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं और आज भी बड़ी संख्या में लोग मां भवानी के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।

__ नवरात्रि में भक्तिमय हो उठता है पूरा परिसर

नवरात्रि के दौरान मां भवानी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के कारण माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है। दूर-दराज के गांवों और जिलों से श्रद्धालु यहां पहुंचकर मां के चरणों में नारियल, चुनरी और प्रसाद अर्पित करते हैं। मंदिर परिसर में मेले जैसा दृश्य दिखाई देता है। इस दौरान ग्रामीण भी मंदिर की व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुविधा में बढ़-चढ़कर सहयोग करते हैं।हर पूर्णिमा पर 24 घंटे गूंजता है हरि-कीर्तनमंदिर की एक प्रमुख विशेषता प्रत्येक पूर्णिमा पर आयोजित होने वाला 24 घंटे का अखंड हरि-कीर्तन है। इस धार्मिक आयोजन में गांव के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। भजन-कीर्तन और भगवान के नाम-स्मरण से मंदिर परिसर का वातावरण आध्यात्मिक हो उठता है। इस आयोजन में युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक की भागीदारी देखने को मिलती है।मंदिर की देखरेख कर रहे विनोद सिंह बताते हैं कि मां भवानी के प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा है। नवरात्रि के दिनों में यहां श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। उनके अनुसार, मंदिर गांव और आसपास के इलाके के लोगों की धार्मिक आस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है।

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गांव के मोहित दुबे बताते है कि मां भवानी मंदिर लोगों की गहरी आस्था और विश्वास का केंद्र है। श्रद्धालु यहां निष्कपट भाव से पूजा-अर्चना कर सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। पूर्णिमा का अखंड हरि-कीर्तन और नवरात्रि के विशेष अनुष्ठान मंदिर की धार्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखते हैं।

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गांव के मां काली मंदिर के महंत राजू दुबे बताते हैं कि वर्ष 1986 में जंगल से मां भवानी की प्रतिमा मिलने की घटना आज भी उन्हें याद है। उनके अनुसार, प्रतिमा की खोज और पुनर्स्थापना गांव के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रसंग है।

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श्रद्धालु अंटू उपाध्याय कहते हैं कि मां भवानी के दरबार में लोगों की गहरी आस्था है। नवरात्रि के दौरान पूरा गांव पूजा-अर्चना और श्रद्धालुओं की सेवा में जुट जाता है। 

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स्थानीय युवा रविंद्र कुमार का कहना है कि प्रत्येक पूर्णिमा पर होने वाला अखंड हरि-कीर्तन सामाजिक एकता और धार्मिक परंपरा को मजबूत करता है। मंदिर क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

__ संरक्षण की जरूरत, ताकि जीवंत रहे विरासत

केसठ का मां भवानी मंदिर धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय इतिहास और लोकपरंपरा का भी प्रतीक है। चेरो-खरवार काल से जुड़ी मानी जाने वाली प्रतिमा और वर्ष 1986 में उसकी खोज की कहानी इस स्थल को विशेष बनाती है। ऐसे प्राचीन धार्मिक स्थलों के इतिहास का दस्तावेजीकरण, प्रतिमा की ऐतिहासिक पहचान का विशेषज्ञों से अध्ययन और मंदिर परिसर का समुचित संरक्षण आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस विरासत से परिचित हो सकें।आज मां भवानी मंदिर में गूंजते भजन, पूर्णिमा का अखंड हरि-कीर्तन और नवरात्रि में उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात की गवाही देते हैं कि समय बदलने के बावजूद लोगों की आस्था और अपनी प्राचीन परंपराओं से जुड़ाव आज भी कायम है।