छह माह में 5 किमी भी नहीं बनी सड़क, डुमरांव का बाजार जाम में कैद, प्रशासन की सुस्ती से टूट रहा शहर का कारोबार

डुमरांव शहर की जीवनरेखा मानी जाने वाली स्टेशन रोड आज खुद बदहाली की मिसाल बन चुकी है। स्टेट हाईवे की श्रेणी में शामिल इस मुख्य सड़क का जीर्णाेद्धार कार्य पिछले छह महीनों से अधर में लटका है, जिससे आम जनजीवन से लेकर शहर की पूरी आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई है। हालात ऐसे हैं कि लगभग 5 किलोमीटर लंबी सड़क तय समय के कई सप्ताह बाद भी पूरी नहीं हो सकी, जबकि बाजार और शहर की धड़कन लगातार धीमी पड़ती जा रही है।

छह माह में 5 किमी भी नहीं बनी सड़क, डुमरांव का बाजार जाम में कैद,  प्रशासन की सुस्ती से टूट रहा शहर का कारोबार

-- मुख्य सड़क बंद, कारोबार ठप; 1.38 करोड़ की योजना कागज़ों में दौड़ रही, ज़मीन पर रेंग रहा काम

केटी न्यूज/डुमरांव

डुमरांव शहर की जीवनरेखा मानी जाने वाली स्टेशन रोड आज खुद बदहाली की मिसाल बन चुकी है। स्टेट हाईवे की श्रेणी में शामिल इस मुख्य सड़क का जीर्णाेद्धार कार्य पिछले छह महीनों से अधर में लटका है, जिससे आम जनजीवन से लेकर शहर की पूरी आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई है। हालात ऐसे हैं कि लगभग 5 किलोमीटर लंबी सड़क तय समय के कई सप्ताह बाद भी पूरी नहीं हो सकी, जबकि बाजार और शहर की धड़कन लगातार धीमी पड़ती जा रही है।मुख्य बाजार क्षेत्र में सड़क को जगह-जगह खोद दिए जाने और लंबे समय से लागू ट्रैफिक डायवर्जन ने डुमरांव को मानो चारों ओर से जकड़ लिया है। बीते पंद्रह दिनों से बाजार में सभी प्रकार के वाहनों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। नतीजा यह कि दुकानों पर सन्नाटा पसरा है, ग्राहक नदारद हैं और व्यापारी आर्थिक तंगी से जूझने को मजबूर हैं।

-- कागज़ों में तेज, ज़मीन पर सुस्त निर्माण

करीब 1.38 करोड़ रुपये की लागत से पुराना भोजपुर से मां डुमरेजनी प्रवेश द्वार तक सड़क जीर्णाेद्धार की योजना बनाई गई थी। विभागीय अधिकारियों ने दावा किया था कि 14 जनवरी तक कार्य पूरा कर सड़क खोल दी जाएगी, लेकिन तय समय बीत जाने के एक महीने बाद भी हालात जस के तस बने हुए हैं।राज अस्पताल, महरौरा मोड़, राज हाई स्कूल के खेल मैदान और नगर परिषद के पुराने कार्यालय के पास निर्माण कार्य की मंथर गति साफ देखी जा सकती है। कहीं आधी-अधूरी ढलाई, तो कहीं लंबे समय से यूं ही खोदी गई सड़कें लोगों की परेशानी बढ़ा रही हैं।

-- लगन के सीजन में भी बाजार सूना

शादी-ब्याह के इस लगन भरे मौसम में भी डुमरांव बाजार की रौनक लौट नहीं सकी। भारी वाहनों का प्रवेश बंद होने से बाहर से आने वाले व्यापारी और खरीददार बाजार तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। टेढ़की पुल के रास्ते महरौरा मोड़ तक किया गया डायवर्जन समय और खर्च दोनों बढ़ा रहा है, जिससे ग्राहक सीधे डुमरांव से मुंह मोड़ने लगे हैं।

-- मेंटेनेंस की शर्त, पर निर्माण ही अधूरा

निविदा शर्तों के अनुसार निर्माण एजेंसी को सड़क बनने के बाद एक वर्ष तक मेंटेनेंस की जिम्मेदारी भी निभानी है। लेकिन छह महीने बीत जाने के बावजूद जब प्रथम चरण का काम ही पूरा नहीं हो सका, तो रखरखाव की उम्मीद बेमानी लगती है। विभागीय सूत्रों का आरोप है कि एजेंसी जानबूझकर काम की रफ्तार धीमी रख रही है, ताकि समय सीमा करीब आते ही एकमुश्त काम दिखाकर मेंटेनेंस की जवाबदेही से बचा जा सके।

-- लागत घटाई गई, लेकिन नतीजा शून्य

जानकारी के मुताबिक इस सड़क का टेंडर अगस्त में हुआ था। पहले पीडब्ल्यूडी ने 1.594 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा था, जिसे समीक्षा के बाद घटाकर 1.348 करोड़ रुपये किया गया। योजना में सीमेंट कंक्रीट सड़क का प्रतिस्थापन, गड्ढों की भराई, बिटुमिनस कंक्रीट से पैच मरम्मत, जलजमाव से निपटने के लिए ह्यूम पाइप और बॉक्स कल्वर्ट निर्माण शामिल है। सब कुछ तय होने के बावजूद धरातल पर काम अधूरा है।

-- व्यवसायियों का फूटा गुस्सा

कपड़ा व्यवसायी विवेक कांत, किराना व्यापारी बब्लू कुमार, चौंबर ऑफ कॉमर्स के उपाध्यक्ष शत्रुघ्न प्रसाद गुप्ता, दवा व्यवसायी रमेश केशरी और मोबाइल विक्रेता दीपक कुमार समेत कई व्यवसायियों का कहना है कि सड़क निर्माण के नाम पर शहर की अर्थव्यवस्था को बंधक बना लिया गया है। उनका आरोप है कि प्रशासन और निर्माण एजेंसी की लापरवाही से उनका महीनों का कारोबार चौपट हो गया।

-- अब आम लोग भी उबलने लगे

सिर्फ व्यापारी ही नहीं, आम नागरिकों में भी गहरा आक्रोश है। लोगों का कहना है कि पिछले छह महीनों से शहर में रहना किसी कैद से कम नहीं लग रहा। एंबुलेंस, स्कूली वाहन और रोजमर्रा के आवागमन में भारी दिक्कतें हो रही हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन मानो आंख मूंदे बैठा है।

-- राजगोला रोड का अतिक्रमण बना दूसरी बड़ी मुसीबत

एक ओर मुख्य सड़क बंद है, दूसरी ओर राजगोला रोड पर अतिक्रमण ने परेशानी और बढ़ा दी है। ठेला-खोमचा वालों के कब्जे से यह व्यावसायिक मार्ग दिनभर जाम रहता है। पैदल चलना तक मुश्किल हो गया है, लेकिन बार-बार मांग के बावजूद नगर परिषद प्रशासन अतिक्रमण हटाने में नाकाम साबित हो रहा है।डुमरांव की जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि आखिर शहर की इस दुर्दशा की जिम्मेदारी कौन लेगा। क्या करोड़ों की योजनाएं सिर्फ फाइलों में दौड़ेंगी, या कभी जमीन पर भी समय से पूरी होंगी।