सरहुल में झलकी प्रकृति की आस्था, चौसा में परंपरा और पर्यावरण का अनोखा संगम

चौसा प्रखंड में इस बार आदिवासी समाज का महापर्व सरहुल पूजा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि प्रकृति के प्रति गहरी आस्था और पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश बनकर उभरा। स्थानीय पंचायत में आयोजित इस कार्यक्रम ने पारंपरिक संस्कृति और आधुनिक जागरूकता का सुंदर संगम प्रस्तुत किया।

सरहुल में झलकी प्रकृति की आस्था, चौसा में परंपरा और पर्यावरण का अनोखा संगम

__ पूजा के साथ पौधारोपण, जल-जंगल-जमीन बचाने का लिया संकल्प

केटी न्यूज/चौसा

चौसा प्रखंड में इस बार आदिवासी समाज का महापर्व सरहुल पूजा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि प्रकृति के प्रति गहरी आस्था और पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश बनकर उभरा। स्थानीय पंचायत में आयोजित इस कार्यक्रम ने पारंपरिक संस्कृति और आधुनिक जागरूकता का सुंदर संगम प्रस्तुत किया।आदिवासी बहरवार पूजा समिति के तत्वावधान में आयोजित इस पर्व में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। पूरे आयोजन में पारंपरिक रीति-रिवाजों की झलक साफ दिखाई दी। पूजा का संचालन ललन खरवार ने विधि-विधान के साथ संपन्न कराया, जिसमें प्रकृति को साक्षी मानकर जल, जंगल और जमीन की महत्ता को याद किया गया।

सरहुल, जिसे प्रकृति पूजा का पर्व माना जाता है, आदिवासी समाज के जीवन दर्शन को दर्शाता है। इस अवसर पर समाज के लोगों ने पेड़ों, नदियों और धरती को जीवन का आधार मानते हुए उनके संरक्षण का संकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान वातावरण पूरी तरह से पारंपरिक गीतों और सांस्कृतिक भावनाओं से सराबोर रहा।इस आयोजन की खास बात यह रही कि पूजा के बाद पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक विशेष पहल की गई। उपस्थित लोगों ने सामूहिक रूप से एक पेड़ लगाकर यह संदेश दिया कि सिर्फ पूजा करना ही नहीं, बल्कि प्रकृति को बचाना भी हमारी जिम्मेदारी है।समिति के अध्यक्ष बिहारी खरवार और प्रखंड अध्यक्ष दीपक खरवार ने कहा कि सरहुल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि हमारी पहचान और संस्कृति का प्रतीक है।

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि बदलते समय में भी आदिवासी समाज अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।उन्होंने लोगों से अपील की कि हर व्यक्ति साल में कम से कम एक पेड़ जरूर लगाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण मिल सके।कार्यक्रम के अंत में समाज और देश की उन्नति, शांति और एकजुटता के लिए प्रार्थना की गई। इस दौरान जवाहिर खरवार, अशोक खरवार, छोटक गोंड, बबन खरवार, भरत खरवार, मिथुन खरवार, प्रदीप खरवार, नित्यानंद खरवार, सोनू खरवार समेत दर्जनों लोग उपस्थित रहे।सरहुल पूजा का यह आयोजन न सिर्फ आस्था का प्रतीक बना, बल्कि यह संदेश भी दे गया कि प्रकृति के बिना जीवन संभव नहीं है और उसकी रक्षा करना हम सभी का कर्तव्य है।