गर्मी में फिर लौटी परंपरा: मटके-सुराही की बढ़ी मांग, कुम्हारों को मिला सहारा
भीषण गर्मी के बीच एक बार फिर पारंपरिक मिट्टी के घड़े और सुराही लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। आधुनिक तकनीक और फ्रिज के बढ़ते उपयोग के बावजूद बड़ी संख्या में लोग प्राकृतिक रूप से ठंडे और स्वादिष्ट पानी के लिए मिट्टी के बर्तनों की ओर लौट रहे हैं।

__ प्राकृतिक ठंडक और सेहत के फायदे के कारण बढ़ा आकर्षण, बढ़ती लागत व मिट्टी की कमी से जूझ रहे कारीगर
केटी न्यूज/डुमरांव।
भीषण गर्मी के बीच एक बार फिर पारंपरिक मिट्टी के घड़े और सुराही लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। आधुनिक तकनीक और फ्रिज के बढ़ते उपयोग के बावजूद बड़ी संख्या में लोग प्राकृतिक रूप से ठंडे और स्वादिष्ट पानी के लिए मिट्टी के बर्तनों की ओर लौट रहे हैं। इसका सीधा लाभ कुम्हार समुदाय को मिल रहा है, जिनकी बिक्री में इन दिनों उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जा रही है।डुमरांव शहर के लंगटू महादेव मंदिर के आसपास, टेढ़ी बाजार, साफाखाना रोड समेत विभिन्न इलाकों में मिट्टी के बर्तनों की दुकानें सजी हुई हैं। यहां घड़े, सुराही, मटकी और अन्य पारंपरिक उत्पादों की खरीदारी के लिए लोगों की भीड़ देखी जा रही है।

कम खर्च में ठंडा पानी उपलब्ध कराने वाले इन बर्तनों को लोग ‘देसी फ्रिज’ के रूप में भी पहचान दे रहे हैं।बाजार में अब पारंपरिक घड़ों के साथ आकर्षक डिजाइन और आधुनिक रूप वाले मिट्टी के बर्तन भी उपलब्ध हैं। इन्हें रसोई, ड्राइंग रूम और डाइनिंग एरिया में सजावटी उपयोग के लिए भी खरीदा जा रहा है। सामान्य और मध्यम वर्ग के परिवारों में इनकी मांग सबसे अधिक देखी जा रही है।स्थानीय कुम्हार मनसुख प्रजापति, ललन प्रसाद और शिवरात्रि प्रजापति ने बताया कि मिट्टी के बर्तन बनाना उनका पैतृक व्यवसाय है। पूरे वर्ष इसी कार्य से परिवार का भरण-पोषण होता है। उनका कहना है कि पहले की तुलना में इस पेशे से आमदनी घटी है, लेकिन गर्मी के मौसम में बिक्री बढ़ने से कुछ राहत मिलती है।

कारीगरों के अनुसार एक अच्छी गुणवत्ता का घड़ा तैयार करने में चार से पांच दिन का समय लगता है।मिट्टी तैयार करने, चाक पर आकार देने, धूप में सुखाने और भट्ठी में पकाने जैसी कई प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद उत्पाद तैयार होता है।विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी के घड़े में मौजूद सूक्ष्म छिद्र वाष्पीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से पानी को स्वाभाविक रूप से ठंडा रखते हैं। यही कारण है कि घड़े का पानी लंबे समय तक शीतल और स्वादिष्ट बना रहता है। चिकित्सकों का भी मानना है कि मिट्टी के बर्तनों में रखा पानी शरीर के लिए लाभकारी होता है तथा पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में सहायक माना जाता है।

हालांकि बढ़ती मांग के बावजूद कुम्हार समुदाय कई समस्याओं से जूझ रहा है। कारीगरों का कहना है कि पहले आसपास के क्षेत्रों में आसानी से उपयुक्त मिट्टी उपलब्ध हो जाती थी, लेकिन अब ईंट भट्ठों के विस्तार और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण अच्छी मिट्टी मिलना कठिन हो गया है। कई बार उन्हें दूसरे जिलों या राज्यों से तैयार घड़े मंगाकर बेचने पड़ते हैं, जिससे मुनाफा कम हो जाता है। इसके अलावा प्लास्टिक, स्टील और फाइबर से बने सस्ते उत्पादों की प्रतिस्पर्धा भी उनके पारंपरिक व्यवसाय पर असर डाल रही है। इसके बावजूद कुम्हारों का कहना है कि यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, परंपरा और पहचान से जुड़ा हुआ पेशा है, जिसे बचाए रखना समय की आवश्यकता है।

