गरमा बीज वितरण के साथ चौसा में टिकाऊ खेती अभियान तेज, किसानों को हरी खाद अपनाने की सलाह

चौसा प्रखंड में गरमा मौसम की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग ने बीज वितरण अभियान शुरू कर दिया है। इस बार विभाग केवल अनुदानित बीज उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों को टिकाऊ खेती, कम लागत उत्पादन और मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए भी जागरूक कर रहा है। प्रखंड कृषि कार्यालय से ऑनलाइन आवेदन करने वाले किसानों को अनुदानित दर पर बीज दिया जा रहा है।

गरमा बीज वितरण के साथ चौसा में टिकाऊ खेती अभियान तेज, किसानों को हरी खाद अपनाने की सलाह

__ मूंग, मक्का और उरद के अनुदानित बीज बांटे जा रहे; फसल अवशेष खेत में पलटने से बढ़ेगी मिट्टी की उर्वरा शक्ति

केटी न्यूज/चौसा

चौसा प्रखंड में गरमा मौसम की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग ने बीज वितरण अभियान शुरू कर दिया है। इस बार विभाग केवल अनुदानित बीज उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों को टिकाऊ खेती, कम लागत उत्पादन और मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए भी जागरूक कर रहा है। प्रखंड कृषि कार्यालय से ऑनलाइन आवेदन करने वाले किसानों को अनुदानित दर पर बीज दिया जा रहा है।प्रखंड कृषि पदाधिकारी राकेश कुमार ने बताया कि जिले को गरमा फसल कार्यक्रम के तहत मूंग का 7 क्विंटल, हाईब्रिड मक्का का 4.24 क्विंटल तथा उरद का 2.24 क्विंटल बीज आवंटित किया गया है। चौसा प्रखंड के विभिन्न पंचायतों से किसानों ने ऑनलाइन आवेदन किया था।

इनमें से अब तक 35 किसानों को बीज उपलब्ध कराया जा चुका है, जबकि शेष किसानों को कार्यालय से संपर्क कर शीघ्र बीज लेने को कहा गया है।उन्होंने बताया कि गरमा फसल किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का बेहतर विकल्प है। कम समय में तैयार होने वाली मूंग और उरद जैसी दलहनी फसलें न केवल बाजार में अच्छी कीमत देती हैं, बल्कि खेत की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाती हैं। वहीं हाईब्रिड मक्का नकदी फसल के रूप में किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।कृषि विभाग इस बार किसानों को हरी खाद के महत्व से भी अवगत करा रहा है। अधिकारियों के अनुसार फसल तैयार होने के बाद फली तोड़ने के बाद बचे पौधों और अवशेषों को खेत में पलट देने से यह प्राकृतिक हरी खाद का रूप ले लेता है।

इससे मिट्टी में कार्बनिक तत्वों की मात्रा बढ़ती है और नाइट्रोजन की पूर्ति होती है।विशेषज्ञों का कहना है कि हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में सूक्ष्म जीवाणु सक्रिय होते हैं, जिससे जमीन की गुणवत्ता बेहतर होती है और अगली फसल का उत्पादन बढ़ता है। इससे किसानों को रासायनिक खाद पर होने वाले अतिरिक्त खर्च से भी राहत मिलती है।कृषि विभाग का मानना है कि बीज वितरण के साथ यदि किसान प्राकृतिक पोषण तकनीकों को अपनाते हैं तो खेती अधिक टिकाऊ, किफायती और लाभदायक बन सकती है। चौसा क्षेत्र में इस पहल को किसानों के बीच सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है।