मिलते-जुलते नाम की कंपनियों के खेल में उलझा शिक्षा विभाग, सफाई कार्य में बड़े वित्तीय घोटाले की आशंका

जिला शिक्षा कार्यालय बक्सर एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में आ गया है। इस बार मामला सरकारी विद्यालयों में साफ-सफाई कार्य से जुड़ा है, जहां मिलते-जुलते नाम वाली कंपनियों के जरिये कथित तौर पर वित्तीय गड़बड़ी को अंजाम देने का आरोप सामने आया है।

मिलते-जुलते नाम की कंपनियों के खेल में उलझा शिक्षा विभाग, सफाई कार्य में बड़े वित्तीय घोटाले की आशंका

-- फर्स्ट आईडिया डिजिटल एप्लीकेशन ने निविदा डाला व विभाग से चयनित हुआ जबकि कार्यादेश मिला फर्स्टआईडिया डिजिटल्स एपलिकेशन को 

-- मामला डीईओ के संज्ञान में आने के बावजूद नहीं हो रही है कार्रवाई, कही तथाकथित शिक्षा माफियाओं की करतूत तो नहीं

केटी न्यूज/बक्सर।

जिला शिक्षा कार्यालय बक्सर एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में आ गया है। इस बार मामला सरकारी विद्यालयों में साफ-सफाई कार्य से जुड़ा है, जहां मिलते-जुलते नाम वाली कंपनियों के जरिये कथित तौर पर वित्तीय गड़बड़ी को अंजाम देने का आरोप सामने आया है। साक्ष्यों के साथ दिए गए एक आवेदन ने पूरे शिक्षा महकमे में हड़कंप मचा दिया है और अब जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

-- चयनित एजेंसी एक, भुगतान दूसरी को

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि शिक्षा विभाग द्वारा जिस हाउसकिपिंग एजेंसी का चयन किया गया था, कार्य और भुगतान उससे अलग नाम की कंपनी को कर दिया गया। आवेदन के अनुसार, विभाग की ओर से फर्स्ट आईडिया डिजिटल एप्लीकेशन प्राइवेट लिमिटेड को चयनित किया गया था, लेकिन जिला स्तर पर हुए एकरारनामे और भुगतान फर्स्ट आईडिया डिजिटल्स एप्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड नामक दूसरी कंपनी को किए जा रहे हैं। नाम में मामूली फर्क दिखाने वाली ये दोनों कंपनियां वास्तव में पूरी तरह अलग हैं। दोनों का जीएसटी नंबर, पैन कार्ड, सीआईएन नंबर तक अलग-अलग बताया गया है। यही नहीं, चयनित कंपनी वर्ष 2015 में पंजीकृत है, जबकि जिसके साथ एकरारनामा हुआ, वह कंपनी वर्ष 2019 में पंजीकृत बताई जा रही है।

-- पत्रांक 1515 बना गड़बड़ी की बुनियाद

आवेदन में उल्लेख है कि शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव एवं निदेशक (प्रशासन) द्वारा पत्रांक 1515 के माध्यम से जिलों को चयनित एजेंसियों की सूची उपलब्ध कराई गई थी। इसी पत्र के आधार पर बक्सर जिले के तीन प्रखंडों में साफ-सफाई का कार्य आवंटित किया गया। लेकिन आरोप है कि इसी प्रक्रिया का फायदा उठाते हुए मिलते-जुलते नाम वाली दूसरी कंपनी को काम और भुगतान दे दिया गया, जो स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है।

-- दो साल से चल रहा खेल

सबसे गंभीर बात यह है कि यह कथित गड़बड़ी कोई नई नहीं, बल्कि पिछले दो वर्षों से जारी बताई जा रही है। आरोपित एजेंसी इस दौरान जिले के तीन प्रखंडों के सरकारी स्कूलों में साफ-सफाई कार्य कर रही है और नियमित रूप से भुगतान भी प्राप्त कर रही है। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि सुनियोजित वित्तीय घोटाले का रूप ले सकता है।

-- शिकायत के साथ सौंपे गए ठोस साक्ष्य

डीईओ कार्यालय को दिए गए आवेदन में कंपनियों से जुड़े दस्तावेज, जीएसटी, पैन और सीआईएन से संबंधित साक्ष्य संलग्न किए गए हैं। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर पूरे प्रकरण की परतें खुलनी शुरू हुई हैं। आवेदन मिलने के बाद कार्यालय में अफरातफरी का माहौल है और अधिकारी भी सतर्क हो गए हैं।

-- जांच कमेटी बनेगी, दोषियों पर होगी कार्रवाई

इस मामले में जिला शिक्षा पदाधिकारी संदीप रंजन ने स्वीकार किया कि साक्ष्य के साथ आवेदन प्राप्त हुआ है। उन्होंने बताया कि विभाग से उस एजेंसी के सभी मूल दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, जिसका नाम पत्रांक 1515 में दर्ज है। सभी दस्तावेजों का मिलान कर जांच कमेटी गठित की जाएगी। डीईओ ने स्पष्ट कहा कि जांच में यदि किसी भी स्तर पर गड़बड़ी या मिलीभगत सामने आती है, तो दोषियों के खिलाफ सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

-- कही तथाकथित माफियाओं की कारगुजारी तो नहीं

इस पूरे प्रकरण ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबकी निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि यह महज तकनीकी चूक है या फिर करोड़ों के संभावित घोटाले की सुनियोजित कहानी। वहीं, दबे जुबां विभागीय जानकारी आशंका जता रहे है कि कही इस खेल के मास्टरमाइंड विभाग में सक्रिय तथाकथित शिक्षा माफिया तो नहीं है। हालांकि, यह जांच के बाद ही कुछ स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल मामला डीईओ के संज्ञान में आने बावजूद अबतक कार्रवाई नहीं होने से कई सवाल खड़े हो रहे है।