संसार में रहकर ईश्वर-स्मरण ही जीवन का परम धर्म - उमेश भाई ओझा
सदर प्रखंड के हनुमत धाम मंदिर परिसर में आयोजित संत सदगुरुदेव स्मृति महोत्सव के अंतर्गत चल रही श्रीमद् भागवत कथा ने भक्तों को आध्यात्मिक आनंद से सराबोर कर दिया। कथा के आठवें दिन सोमवार को पूज्य व्यास उमेश भाई ओझा ने भगवान की लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया

-- हनुमत धाम में भागवत कथा के आठवें दिन भक्ति, वैराग्य और लीला प्रसंगों की अमृतधारा
केटी न्यूज/बक्सर।
सदर प्रखंड के हनुमत धाम मंदिर परिसर में आयोजित संत सदगुरुदेव स्मृति महोत्सव के अंतर्गत चल रही श्रीमद् भागवत कथा ने भक्तों को आध्यात्मिक आनंद से सराबोर कर दिया। कथा के आठवें दिन सोमवार को पूज्य व्यास उमेश भाई ओझा ने भगवान की लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि संसार का कार्य करते हुए भगवान का स्मरण करना ही सच्ची और सरल भक्ति है। कथा स्थल पर बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालु भक्ति रस में डूबे नजर आए।

-- षट्विकारों से मुक्ति का मार्ग है भक्ति
अपने प्रवचन में व्यास जी ने कहा कि मनुष्य के जीवन में दुखों का मूल कारण छह विकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर हैं। जब तक इन विकारों पर नियंत्रण नहीं होता, तब तक आत्मिक शांति संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि संतों की संगति और पवित्र ग्रंथों का अध्ययन ही इन विकारों से मुक्ति का सशक्त माध्यम है। भक्ति के मार्ग पर चलकर ही मनुष्य अपने अंतर्मन को शुद्ध कर सकता है।
-- प्रह्लाद-नृसिंह प्रसंग से मिला आस्था का संदेश
कथा के दौरान भगवान नृसिंह और भक्त प्रह्लाद की कथा का मार्मिक वर्णन किया गया। व्यास जी ने बताया कि किस प्रकार प्रभु की भक्ति क्रोध और अहंकार का नाश कर देती है। हिरण्यकश्यप के अत्याचारों के बावजूद प्रह्लाद का अडिग विश्वास यह सिखाता है कि ईश्वर पर अटूट आस्था रखने वाला भक्त कभी पराजित नहीं होता।

-- ब्रह्मा का मोह भंग और कृष्ण की माया
भागवत कथा में ब्रह्मा जी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने का प्रसंग भी सुनाया गया। व्यास जी ने बताया कि जब ब्रह्मा जी ने ग्वाल-बालों और बछड़ों को चुरा लिया, तब भगवान ने स्वयं उनके रूप धारण कर अपनी लीला से ब्रह्मा जी का अहंकार समाप्त कर दिया। अंततः ब्रह्मा जी ने प्रभु की शरण में आकर अपनी भूल स्वीकार की। इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं को यह बोध कराया कि ईश्वर की माया से कोई भी अछूता नहीं है।

-- गोवर्धन लीला, भक्तवत्सल भगवान का सजीव दर्शन
कथा का प्रमुख आकर्षण गोवर्धन लीला का सजीव वर्णन रहा। व्यास जी ने बताया कि मात्र सात वर्ष की आयु में भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के अहंकार को चूर करने और ब्रजवासियों की रक्षा के लिए सात दिन और सात रात तक गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाए रखा। इस लीला के माध्यम से भगवान के ऐश्वर्य, करुणा और भक्तवत्सल स्वरूप का दर्शन हुआ।

-- भक्ति का सार, नाम स्मरण और कर्तव्य पालन
कथा के समापन पर व्यास जी ने कहा कि संसार का सुख-दुख क्षणभंगुर है, लेकिन प्रभु का नाम शाश्वत है। यदि मनुष्य अपने सांसारिक कर्तव्यों को भगवान का कार्य समझकर करे और हर क्षण ईश्वर का स्मरण करे, तो वही सच्ची भक्ति है। संध्या भजन कार्यक्रम में राम वचन व्यास, प्रवीण कुमार, सीताराम चतुर्वेदी, आर्यन बाबू, डॉ. रवि कुमार सहित अन्य कलाकारों ने भक्तिमय प्रस्तुतियों से वातावरण को और भी आध्यात्मिक बना दिया।
