चौसा कस्तुरबा आवासीय विद्यालय में मूक-बधिर छात्रा की संदिग्ध परिस्थिति में मौत, व्यवस्था पर उठे सवाल

बनारपुर स्थित चौसा प्रखंड के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में 13 वर्षीय मूक-बधिर छात्रा की संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो गई है। यह घटना गुरूवार सुबह की है। इसकी जानकारी मिलते ही जहां प्रबंधन व शिक्षा विभाग सकते में आ गया, वहीं बच्ची के अभिभावकों ने इस घटना पर सवाल उठाए है। वहीं, घटना की जानकारी के बाद मौके पर पहंुची स्थानीय पुलिस ने शव को कब्जे में ले पोस्टमार्टम के लिए बक्सर भेज दिया है।

चौसा कस्तुरबा आवासीय विद्यालय में मूक-बधिर छात्रा की संदिग्ध परिस्थिति में मौत, व्यवस्था पर उठे सवाल

-- मूक-बधिर छात्रा की मौत ने खोली आवासीय विद्यालयों की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल

-- ‘देखभाल’ के दावे, ‘जांच’ के भरोसे और एक 13 वर्षीय बच्ची की असमय मौत, कस्तूरबा विद्यालय सवालों के घेरे में

केटी न्यूज/चौसा

बनारपुर स्थित चौसा प्रखंड के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में 13 वर्षीय मूक-बधिर छात्रा की संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो गई है। यह घटना गुरूवार सुबह की है। इसकी जानकारी मिलते ही जहां प्रबंधन व शिक्षा विभाग सकते में आ गया, वहीं बच्ची के अभिभावकों ने इस घटना पर सवाल उठाए है। वहीं, घटना की जानकारी के बाद मौके पर पहंुची स्थानीय पुलिस ने शव को कब्जे में ले पोस्टमार्टम के लिए बक्सर भेज दिया है। यह घटना सरकारी आवासीय विद्यालयों की स्वास्थ्य निगरानी और आपात व्यवस्था पर बड़ा सवाल बनती जा रही है। कक्षा सात की छात्रा मोहिनी कुमारी की मौत ने यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि विशेष आवश्यकता वाली बच्चियों के लिए बनाए गए संस्थानों में संकट के समय कितनी तैयारी वास्तव में मौजूद है।

बुधवार रात से गुरुवार सुबह के बीच की घटनाएं कई खामियों की ओर इशारा करती हैं। विद्यालय प्रबंधन के अनुसार रात में भोजन के बाद सब कुछ सामान्य था, लेकिन सुबह अचानक तबीयत बिगड़ना, उल्टियां शुरू होना और प्राथमिक इलाज तक सीमित रह जाना, ये सब इस ओर संकेत करते हैं कि गंभीर स्थिति को समय रहते पहचाना ही नहीं गया। मूक-बधिर होने के कारण छात्रा अपनी परेशानी स्पष्ट रूप से व्यक्त भी नहीं कर सकती थी, ऐसे में निगरानी की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि एक आवासीय विद्यालय, जहां दर्जनों बच्चियां 24 घंटे रहती हैं, वहां आपात चिकित्सा प्रोटोकॉल क्या है। नमक-चीनी मिला गर्म पानी देना प्राथमिक उपाय हो सकता है, लेकिन जब हालत बिगड़ती जा रही थी, तब न तो प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ मौजूद था और न ही एंबुलेंस जैसी त्वरित सुविधा। निजी वाहन से अस्पताल ले जाना और रास्ते में रेलवे क्रॉसिंग पर जाम में फंस जाना, पूरे सिस्टम की तैयारी पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

विद्यालय प्रबंधन द्वारा नियमित स्वास्थ्य जांच के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन सवाल यह नहीं कि जांच हुई या नहीं, सवाल यह है कि आपात स्थिति में जान बचाने की क्षमता थी या नहीं। विशेष रूप से दिव्यांग छात्राओं के मामले में मामूली लक्षण भी गंभीर हो सकते हैं, जिसे पहचानने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता अनिवार्य होनी चाहिए।प्रशासन अब भोजन रजिस्टर, दवा सूची और सीसीटीवी फुटेज खंगाल रहा है, लेकिन यह जांच तब हो रही है जब एक बच्ची की जान जा चुकी है। परिजनों का आरोप है कि यदि विद्यालय में न्यूनतम चिकित्सा सतर्कता और त्वरित निर्णय लेने की व्यवस्था होती, तो मोहिनी को बचाया जा सकता था। उनका दर्द सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उन सैकड़ों अभिभावकों की चिंता है जो अपनी बच्चियों को भरोसे के साथ ऐसे आवासीय विद्यालयों में भेजते हैं।पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रही है, जिससे मौत का चिकित्सकीय कारण स्पष्ट होगा। लेकिन रिपोर्ट चाहे जो कहे, यह घटना प्रशासनिक लापरवाही, ढीली निगरानी और जमीनी हकीकत से कटे हुए दावों की कहानी जरूर बयां करती है। सवाल अब सिर्फ “मौत कैसे हुई” का नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या ऐसी घटनाओं से सबक लेकर व्यवस्था बदलेगी, या फिर एक और फाइल बंद कर दी जाएगी। मोहिनी की खामोश जिंदगी और उसकी अचानक हुई मौत, सिस्टम की उस चुप्पी को उजागर कर गई है, जो अक्सर सबसे कमजोर बच्चों के साथ हो जाती है।