सूखती धारा, बढ़ता संकट: धर्मावती नदी की बदहाली ने छीनी गांवों की सांस

कभी खेतों की हरियाली, पशुपालकों की राहत और ग्रामीण जीवन की धड़कन मानी जाने वाली धर्मावती नदी आज खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कैमूर से निकलकर रोहतास, बक्सर और भोजपुर के दर्जनों गांवों को जीवन देने वाली यह नदी अब उपेक्षा, गाद जमाव और घटते जलस्तर के कारण धीरे-धीरे सूखती जा रही है।

सूखती धारा, बढ़ता संकट: धर्मावती नदी की बदहाली ने छीनी गांवों की सांस

__ गाद, अतिक्रमण और सरकारी उदासीनता से दम तोड़ रही 76 किमी लंबी नदी, खेती-पशुपालन से लेकर जल संकट तक गहराया खतरा

केटी न्यूज/चक्की

कभी खेतों की हरियाली, पशुपालकों की राहत और ग्रामीण जीवन की धड़कन मानी जाने वाली धर्मावती नदी आज खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कैमूर से निकलकर रोहतास, बक्सर और भोजपुर के दर्जनों गांवों को जीवन देने वाली यह नदी अब उपेक्षा, गाद जमाव और घटते जलस्तर के कारण धीरे-धीरे सूखती जा रही है। भीषण गर्मी के बीच हालात ऐसे हो गए हैं कि कई स्थानों पर धर्मावती नदी अब नदी कम और संकरी नाले जैसी अधिक दिखाई देने लगी है।ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से नदी की समुचित सफाई और कटाई नहीं होने के कारण इसमें भारी मात्रा में गाद, झाड़ियां और कचरा जमा हो गया है। इससे जलधारा बाधित हो रही है और पानी का प्रवाह लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है।

इसका सीधा असर खेती और पशुपालन पर दिखने लगा है। किसानों को अब सिंचाई के लिए निजी मोटर और बोरिंग का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे लागत बढ़ गई है। वहीं पशुपालकों के सामने मवेशियों के लिए पानी की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब गर्मी के मौसम में भी धर्मावती नदी में पर्याप्त पानी रहता था। नदी के सहारे खेतों की सिंचाई होती थी, मछली पालन होता था और छोटे स्तर पर नावों के जरिए व्यापार भी चलता था। लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। बढ़ती उपेक्षा ने इस जीवनदायिनी धारा को संकट में डाल दिया है।

करीब 76 किलोमीटर लंबी धर्मावती नदी कैमूर से निकलकर रोहतास, बक्सर और भोजपुर जिलों से गुजरते हुए सलेमपुर के पास गंगा में मिलती है। प्राचीन काल में इसे कंचन नदी के नाम से जाना जाता था। यह नदी केवल जल स्रोत ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान भी रही है। संत-कवि दरिया साहब की स्मृतियां और हिंदी साहित्यकार शिवपूजन सहाय का गांव उनवास भी इसी नदी तट से जुड़ा हुआ है।भरियार, अरक, योगिया समेत कई गांवों से होकर गुजरने वाली धर्मावती नदी की सफाई और जीर्णोद्धार की मांग वर्षों से उठती रही है। वर्ष 2019-20 में मनरेगा के तहत नदी की गाद निकासी और संरक्षण को लेकर लगभग 1.30 करोड़ रुपये की योजना तैयार की गई थी, लेकिन यह योजना अब तक सरकारी फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी।

अप्रैल 2026 में स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चक्की प्रखंड विकास पदाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर नदी की सफाई, जल-जीवन-हरियाली योजना से जोड़ने और रोजगार सृजन की मांग उठाई थी। बावजूद इसके अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।सामाजिक कार्यकर्ता लालू तुरहा ने बताया कि पूर्व में जिलाधिकारी को भी नदी संरक्षण, जल संचयन और संभावित जल संकट को लेकर पत्र दिया गया था, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर अब तक गंभीर पहल नहीं हुई।ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द सफाई, गाद निकासी, जल संरक्षण और नदी किनारे वृक्षारोपण अभियान शुरू नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में धर्मावती नदी पूरी तरह खत्म होने की कगार पर पहुंच सकती है। इसका असर केवल खेती या पशुपालन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे इलाके में जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन का खतरा भी बढ़ जाएगा।