राष्ट्रीय सेवा योजना के मंच पर डुमरांव की बेटी का दमखम, 15 राज्यों को पीछे छोड़ नूरी बनीं अव्वल

डुमरांव की गलियों से उठी एक आवाज ने राष्ट्रीय मंच पर अपनी गूंज दर्ज कराई है। सात दिवसीय राष्ट्रीय एकता शिविर में आशुभाषण प्रतियोगिता के दौरान जब नूरी ने “राष्ट्र निर्माण में एनएसएस की भूमिका” विषय पर अपने विचार रखे, तो सभागार देर तक तालियों से गूंजता रहा। 15 राज्यों के 210 प्रतिभागियों के बीच उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त कर बिहार को गौरवान्वित किया।

राष्ट्रीय सेवा योजना के मंच पर डुमरांव की बेटी का दमखम, 15 राज्यों को पीछे छोड़ नूरी बनीं अव्वल

-- तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय एकता शिविर में आशुभाषण में प्रथम स्थान, राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका पर रखा प्रभावशाली पक्ष

केटी न्यूज/डुमरांव

डुमरांव की गलियों से उठी एक आवाज ने राष्ट्रीय मंच पर अपनी गूंज दर्ज कराई है। सात दिवसीय राष्ट्रीय एकता शिविर में आशुभाषण प्रतियोगिता के दौरान जब नूरी ने “राष्ट्र निर्माण में एनएसएस की भूमिका” विषय पर अपने विचार रखे, तो सभागार देर तक तालियों से गूंजता रहा। 15 राज्यों के 210 प्रतिभागियों के बीच उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त कर बिहार को गौरवान्वित किया।4 से 10 फरवरी तक आयोजित यह शिविर तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय की मेजबानी में संपन्न हुआ।

विविध वेशभूषाओं और संस्कृतियों से सजे प्रतिभागियों के बीच नूरी की तार्किक सोच, स्पष्ट उच्चारण और आत्मविश्वास ने निर्णायकों को प्रभावित किया। निर्णायक मंडल ने उनकी विषय की गहराई और प्रस्तुति शैली को उत्कृष्ट बताया।कार्यक्रम में उपस्थित पूर्व केंद्रीय मंत्री सैय्यद शाहनवाज हुसैन, पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश सहित कई अतिथियों ने नूरी को सम्मानित करते हुए कहा कि छोटे शहरों की प्रतिभाएं अब राष्ट्रीय पहचान बना रही हैं।शिविर के दौरान प्रतिभागियों को ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण भी कराया गया।

नूरी ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय के अवशेष और मंदार पर्वत का दौरा कर भारत की ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को नजदीक से महसूस किया।पुराना थाना निवासी इरफान अहमद और सदरुन निसा की पुत्री नूरी पहले भी राष्ट्रीय स्तर पर बिहार का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। परिवार और शिक्षकों का कहना है कि उनकी सफलता निरंतर अभ्यास, अनुशासन और सेवा भाव का परिणाम है।नूरी की यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि अवसर मिलने पर छोटे शहरों की बेटियां भी राष्ट्रीय विमर्श की धुरी बन सकती हैं। डुमरांव की इस बेटी ने साबित कर दिया है कि बुलंद इरादों के सामने कोई सीमा बड़ी नहीं होती।