ब्रह्मपुर के फाल्गुनी मेले में दौड़ी रफ्तार: ‘बाबर’ बना मैदान का बादशाह
बाबा बरमेश्वर नाथ मंदिर की पावन नगरी में आयोजित ऐतिहासिक फाल्गुनी पशु मेला इस बार सिर्फ व्यापार या परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रफ्तार और रोमांच की ऐसी कहानी लिख गया जिसे देखने हजारों आंखें उमड़ पड़ीं। मेले का सबसे बड़ा आकर्षण बनी घोड़ा दौड़ प्रतियोगिता, जहां धूल उड़ाती टापों और दर्शकों की तालियों के बीच रोमांच अपने चरम पर पहुंच गया।
-- बाबा बरमेश्वर नाथ की नगरी में घोड़ा रेस ने बांधा समां, पांच-पांच राउंड की टक्कर ने बढ़ाया रोमांच
केटी न्यूज/ब्रह्मपुर
बाबा बरमेश्वर नाथ मंदिर की पावन नगरी में आयोजित ऐतिहासिक फाल्गुनी पशु मेला इस बार सिर्फ व्यापार या परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रफ्तार और रोमांच की ऐसी कहानी लिख गया जिसे देखने हजारों आंखें उमड़ पड़ीं। मेले का सबसे बड़ा आकर्षण बनी घोड़ा दौड़ प्रतियोगिता, जहां धूल उड़ाती टापों और दर्शकों की तालियों के बीच रोमांच अपने चरम पर पहुंच गया।व्यापारी संघ और घोड़ा मालिकों की पहल पर आयोजित इस प्रतियोगिता में तीन दर्जन से अधिक घोड़े-घोड़ियों ने हिस्सा लिया। पांच-पांच राउंड में हुई इस रेस ने हर बार सांसें थाम दीं। जैसे ही सीटी बजी, घोड़ों की टापों ने मैदान को गूंजा दिया और दर्शकों का उत्साह आसमान छूने लगा।

-- ‘बाबर’ की बादशाहत
मुख्य प्रतियोगिता में पटना के रुदल गोप का घोड़ा “बाबर” सब पर भारी पड़ा। घुड़सवार मेघु ने अद्भुत संतुलन और गति का प्रदर्शन करते हुए प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। हर राउंड में “बाबर” की बढ़त ने उसे दर्शकों का चहेता बना दिया।द्वितीय स्थान रघुनाथपुर, बेगूसराय के प्रिंस यादव के “रघुनाथपुर एक्सप्रेस” को मिला, जिसके सवार राजेश यादव ने कड़ी चुनौती पेश की।तृतीय पुरस्कार गंगौली, बक्सर के योगेंद्र ठाकुर को मिला। उनके घोड़े पर सवार गूंगा ने बेहतरीन नियंत्रण दिखाते हुए शानदार प्रदर्शन किया।विशेष पुरस्कार के रूप में केशोपुर के छोटू मुखिया के घोड़े “वीरु” को सम्मानित किया गया। घुड़सवार मनीष कुमार ने जिस फुर्ती और तालमेल से दौड़ पूरी की, उसने दर्शकों का दिल जीत लिया।

-- अलग-अलग वर्गों में भी दिखी टक्कर
“दो दांत” वर्ग की दौड़ में धामनिया, आरा के पुतुल चौबे का घोड़ा पहले स्थान पर रहा। अशोक ठेकेदार का घोड़ा दूसरे और गौड़ाढ, शाहपुर के शंभू पासवान का घोड़ा तीसरे स्थान पर रहा। इस श्रेणी की रेस भी उतनी ही रोमांचक रही, जितनी मुख्य प्रतियोगिता।घोड़ी वर्ग में नियाज़ीपुर के हीरा यादव की घोड़ी ने बाजी मारी। ढाबी के रामचंद्र यादव की घोड़ी दूसरे और तूफान सिंह की घोड़ी तीसरे स्थान पर रही। इन घोड़ियों की रफ्तार और संतुलन देखने लायक था।छोटी “छकरी” (बच्चा घोड़ा/घोड़ी) दौड़ ने भी खूब तालियां बटोरीं। धामनिया के पुतुल चौबे पहले, केशोपुर के छोटू मिश्रा मुखिया दूसरे और सिसई, सिवान के विजय यादव की घोड़ी तीसरे स्थान पर रही।

-- परंपरा, व्यापार और रोमांच का संगम
आयोजन पूरी तरह शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित रहा। सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। व्यापारी संघ ने बताया कि ऐसी प्रतियोगिताएं न केवल मेले की परंपरा को जीवित रखती हैं, बल्कि घोड़ा पालन और व्यापार को भी बढ़ावा देती हैं।फाल्गुनी पशु मेला एक बार फिर साबित कर गया कि परंपरा जब रफ्तार से मिलती है, तो इतिहास बनता है और इस बार उस इतिहास का नाम था “बाबर”।

