जांच के नाम पर खानापूरी, साक्ष्य के बावजूद हाउसकीपिंग टेंडर में फर्जीवाड़े की नहीं खुली परतें
जिला शिक्षा कार्यालय एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। इस बार मामला सरकारी स्कूलों में शौचालय सफाई के लिए जारी हाउसकीपिंग टेंडर से जुड़ा है, जहां मिलते-जुलते नाम की दो अलग-अलग कंपनियों के खेल ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि विभाग द्वारा चयनित कंपनी के नाम से मिलती-जुलती दूसरी कंपनी ने वर्षों तक काम लिया और लाखों रुपये का भुगतान भी हासिल किया, लेकिन सच्चाई सामने आने के बावजूद जांच के नाम पर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
- मिलते-जुलते नाम की कंपनी को मिला करोड़ों का काम, भुगतान जारी, कार्रवाई ठप
केटी न्यूज/बक्सर
जिला शिक्षा कार्यालय एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। इस बार मामला सरकारी स्कूलों में शौचालय सफाई के लिए जारी हाउसकीपिंग टेंडर से जुड़ा है, जहां मिलते-जुलते नाम की दो अलग-अलग कंपनियों के खेल ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि विभाग द्वारा चयनित कंपनी के नाम से मिलती-जुलती दूसरी कंपनी ने वर्षों तक काम लिया और लाखों रुपये का भुगतान भी हासिल किया, लेकिन सच्चाई सामने आने के बावजूद जांच के नाम पर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।

जानकारी के अनुसार, जिला शिक्षा कार्यालय द्वारा स्कूलों में शौचालय सफाई व्यवस्था के लिए टेंडर निकाला गया था। विभागीय पत्रों में फर्स्ट आईडिया डिजिटल एप्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है। इसी कंपनी के नाम पर कार्य आवंटन होना था। लेकिन एग्रीमेंट के समय चौंकाने वाली लापरवाही सामने आई, जब इसी नाम से मिलती-जुलती एक दूसरी कंपनी फर्स्टआईडिया डिजिटल्स एप्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड से करार कर लिया गया।

हैरानी की बात यह है कि यह दूसरी कंपनी पिछले दो वर्षों से लगातार कार्य करती रही और इसके खाते में लाखों रुपये का भुगतान भी होता रहा। जब इस गड़बड़ी से जुड़े दस्तावेज और साक्ष्य के साथ आवेदन जिला शिक्षा कार्यालय को मिला, तब खुलासा हुआ कि दोनों कंपनियों का पैन नंबर, जीएसटी रजिस्ट्रेशन और अन्य वैधानिक दस्तावेज पूरी तरह अलग-अलग हैं। यानी जिस कंपनी का चयन हुआ था, उसके बजाय एक अलग कंपनी को गलत तरीके से सरकारी काम सौंप दिया गया।

मामला उजागर होते ही जिला शिक्षा कार्यालय में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में जिला शिक्षा पदाधिकारी संदीप रंजन ने तीन सदस्यीय जांच टीम का गठन कर दिया। हालांकि, इसके बाद भी स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं दिख रहा है। जांच के नाम पर फाइलें घूम रही हैं, लेकिन न तो भुगतान पर रोक लगी है और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई हुई है।

सूत्रों का कहना है कि जांच प्रक्रिया सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है और “कोरम पूरा करने” के लिए जांच को लंबा खींचा जा रहा है। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।इस संबंध में जब डीईओ संदीप रंजन से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि “मामले की जांच चल रही है।

इसे गंभीरता से लिया गया है। सभी दस्तावेजों की जांच के बाद आगे का निर्णय लिया जाएगा।” लेकिन सवाल यह है कि जब सबूत सामने हैं, तो कार्रवाई में देरी क्यों?अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या जांच सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह जाएगी, या फिर इस कथित वित्तीय गड़बड़ी में शामिल जिम्मेदारों पर वास्तव में शिकंजा कसेगा।
