तीन साल, ढेरों वादे और ज़मीनी सच्चाई शून्य...
डुमरांव नगर परिषद में सत्ता और भरोसे के बीच की दूरी अब खतरनाक रूप से बढ़ती जा रही है। जिन वादों और बदलाव की उम्मीदों के साथ नगर परिषद का गठन हुआ था, वे आज कागजों और भाषणों तक सिमट कर रह गए हैं। करीब तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी नगर परिषद अपने ही मैनिफेस्टो के 20 प्रतिशत कार्य पूरे नहीं कर सकी है। इस स्थिति ने कार्यकारी सभापति विकास ठाकुर के नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
-- डुमरांव नगर परिषद में “युवा नेतृत्व” की परीक्षा फेल, जनता पूछ रही है जवाबदेही का हिसाब
केटी न्यूज/डुमरांव
डुमरांव नगर परिषद में सत्ता और भरोसे के बीच की दूरी अब खतरनाक रूप से बढ़ती जा रही है। जिन वादों और बदलाव की उम्मीदों के साथ नगर परिषद का गठन हुआ था, वे आज कागजों और भाषणों तक सिमट कर रह गए हैं। करीब तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी नगर परिषद अपने ही मैनिफेस्टो के 20 प्रतिशत कार्य पूरे नहीं कर सकी है। इस स्थिति ने कार्यकारी सभापति विकास ठाकुर के नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।नगर परिषद चुनाव के समय “युवा नेतृत्व” और “पारदर्शी प्रशासन” का नारा जनता के बीच खासा लोकप्रिय हुआ था। सुनीता गुप्ता के चेयरमैन और विकास ठाकुर के डिप्टी चेयरमैन चुने जाने के बाद लोगों को लगा था कि नगर की तस्वीर बदलेगी। लेकिन चेयरमैन के अयोग्य घोषित होने के बाद जब कार्यकारी सभापति के रूप में सारी जिम्मेदारी विकास ठाकुर के कंधों पर आई, तब भी हालात में कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आया।

-- मैनिफेस्टो बनाम हकीकत, फर्क साफ दिखता है
मैनिफेस्टो में अवैध होल्डिंग टैक्स वसूली पर रोक, नगर परिषद के खर्चों को सार्वजनिक करने, जन्मदृ-मृत्यु प्रमाण पत्र में हो रही धांधली खत्म करने, कर्मचारियों के व्यवहार में सुधार और बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने जैसे अहम वादे शामिल थे। इसके साथ ही शहर के बाहर स्थायी कचरा डंपिंग जोन, साफ-सुथरा डुमरांव, नल-जल योजना की मरम्मत और बेहतर सड़क व्यवस्था की बात कही गई थी।लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। शहर में कूड़ा-कचरा आज भी बदबू और बीमारी की वजह बना हुआ है। स्थायी डंपिंग जोन अब भी फाइलों में कैद है। नल-जल योजना कई इलाकों में दम तोड़ चुकी है और सड़कों की हालत लोगों की परेशानी बढ़ा रही है।

-- जनता की आवाज़, वादे भूल गया नेतृत्व
पूर्व वार्ड पार्षद धीरज कुमार और सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप शरण का कहना है कि नगर परिषद में जवाबदेही नाम की चीज़ खत्म होती जा रही है। उनका आरोप है कि होल्डिंग टैक्स के नाम पर मनमानी आज भी जारी है और नगर परिषद कार्यालय में आम नागरिकों को सम्मान के बजाय टालमटोल का सामना करना पड़ता है।
-- बड़ा सवाल, अनुपयोगी खरीददारी पर चुप्पी क्यों
सबसे गंभीर सवाल नगर परिषद में हुई कथित अनुपयोगी खरीददारी को लेकर उठ रहा है। आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि ऐसी कई मशीनें और सामग्रियां खरीदी गईं, जिनका कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं है। हैरानी की बात यह है कि इस पर किसी भी जनप्रतिनिधि ने सार्वजनिक रूप से विरोध नहीं किया। इससे पारदर्शिता और मिलीभगत की आशंका और गहरी हो गई है।

-- अब सवाल सीधे जनता का है
तीन साल बाद भी जब नगर परिषद अपने वादों का आधा हिस्सा भी पूरा नहीं कर सकी, तो जनता का भरोसा टूटना स्वाभाविक है। अब डुमरांव के लोग सिर्फ आश्वासन नहीं, हिसाब चाहते हैं। अगर यही हाल रहा, तो आने वाला समय नगर परिषद के मौजूदा नेतृत्व के लिए सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
