कागजों में इलाज, जमीन पर ताले: बक्सर–डुमरांव के आईसीयू और एमएनसीयू वर्षों से ठप

बक्सर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार किए गए अत्याधुनिक चिकित्सा इकाइयों—बक्सर सदर अस्पताल का आईसीयू और डुमरांव अनुमंडल अस्पताल का मातृ एवं नवजात गहन चिकित्सा केंद्र (एमएनसीयू) वर्षों से बंद पड़े हैं। हालात यह हैं कि कागजों में ये सुविधाएं चालू दिखती हैं, लेकिन हकीकत में इन पर ताले लटके हैं।

कागजों में इलाज, जमीन पर ताले: बक्सर–डुमरांव के आईसीयू और एमएनसीयू वर्षों से ठप

__ करोड़ों खर्च के बाद भी नहीं मिली राहत, स्टाफ की कमी और लापरवाही से जूझ रही स्वास्थ्य व्यवस्था, सीएम से हस्तक्षेप की मांग

केटी न्यूज/डुमरांव

बक्सर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार किए गए अत्याधुनिक चिकित्सा इकाइयों—बक्सर सदर अस्पताल का आईसीयू और डुमरांव अनुमंडल अस्पताल का मातृ एवं नवजात गहन चिकित्सा केंद्र (एमएनसीयू) वर्षों से बंद पड़े हैं। हालात यह हैं कि कागजों में ये सुविधाएं चालू दिखती हैं, लेकिन हकीकत में इन पर ताले लटके हैं।मंगलवार को डुमरांव के समाजसेवी हरेकृष्ण सिंह यादव ने एसडीएम राकेश कुमार के माध्यम से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र भेजकर इन दोनों इकाइयों को तत्काल शुरू कराने की मांग उठाई।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग लगातार भ्रामक दावे कर रहे हैं, जबकि आम मरीजों को इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा।बताया जाता है कि बक्सर सदर अस्पताल में 10 बेड का आईसीयू तैयार करने में भारी राशि खर्च की गई। आधुनिक मशीनें और मॉनिटर भी लगाए गए, लेकिन आवश्यक विशेषज्ञ डॉक्टरों और स्टाफ की कमी के कारण यह यूनिट शुरू ही नहीं हो सकी। स्थिति यह है कि महंगी मशीनें इस्तेमाल के अभाव में खराब होने की कगार पर पहुंच गई हैं। नतीजतन, गंभीर मरीजों को आज भी पटना, वाराणसी या आरा रेफर करना मजबूरी बनी हुई है।

विधानसभा में स्वास्थ्य मंत्री द्वारा आईसीयू चालू होने का दावा किया गया था, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह दावा पूरी तरह खोखला साबित हो रहा है। विभागीय सूत्रों की मानें तो एनेस्थीसिया विशेषज्ञ समेत जरूरी मानव संसाधन की अनुपलब्धता इस विफलता की मुख्य वजह है।इसी तरह डुमरांव अनुमंडल अस्पताल में बना एमएनसीयू भी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। करीब चार साल पहले तैयार इस भवन का उद्घाटन भी बड़े स्तर पर किया गया था, लेकिन कुछ ही घंटों के भीतर इस पर ताला लग गया। आधुनिक उपकरणों से लैस इस यूनिट को चालू करने के लिए कम से कम चार डॉक्टर, दस जीएनएम और छह वार्ड बॉय की जरूरत है, जो अब तक उपलब्ध नहीं कराए जा सके हैं।

इसका सीधा असर क्षेत्र की गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं पर पड़ रहा है। जटिल प्रसव, नवजात संक्रमण और गंभीर मामलों में समय पर इलाज नहीं मिलने से मरीजों की जान जोखिम में पड़ रही है।एसडीएम राकेश कुमार ने बताया कि समाजसेवी द्वारा दिया गया पत्र जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री तक पहुंचाया जाएगा और इस दिशा में आवश्यक कार्रवाई की मांग की जाएगी। अब देखना यह है कि स्वास्थ्य महकमा इन बंद पड़ी जीवनरक्षक इकाइयों को कब तक चालू कर पाता है, या फिर ये योजनाएं यूं ही कागजों तक सीमित रह जाएंगी।