डुमरांव बाईपास में मुआवजा बनाम हकीकत: लाखों की जमीन, हजारों का दाम
डुमरांव बाईपास निर्माण अब सड़क से ज्यादा मुआवजे की लड़ाई बनता जा रहा है। पुराना भोजपुर से टेढ़की पुल तक प्रस्तावित बाईपास के लिए शनिवार को प्रखंड कार्यालय परिसर में मुआवजा शिविर लगाया गया, लेकिन यह शिविर प्रशासन के लिए असहज सवाल छोड़ गया। सैकड़ों प्रभावित रैयतदारों में से महज 10–15 किसान ही आवेदन लेने पहुंचे, जबकि अधिकांश ने मुआवजा दर को “अपमानजनक” बताते हुए साफ इनकार कर दिया।
केटी न्यूज/डुमरांव
डुमरांव बाईपास निर्माण अब सड़क से ज्यादा मुआवजे की लड़ाई बनता जा रहा है। पुराना भोजपुर से टेढ़की पुल तक प्रस्तावित बाईपास के लिए शनिवार को प्रखंड कार्यालय परिसर में मुआवजा शिविर लगाया गया, लेकिन यह शिविर प्रशासन के लिए असहज सवाल छोड़ गया। सैकड़ों प्रभावित रैयतदारों में से महज 10–15 किसान ही आवेदन लेने पहुंचे, जबकि अधिकांश ने मुआवजा दर को “अपमानजनक” बताते हुए साफ इनकार कर दिया।बनकट, पुरैनी, डुमरांव और भोजपुर कदीम मौजा की जमीनें इस परियोजना की जद में हैं।किसानों का आरोप है कि सरकार जानबूझकर 2014–15 के पुराने सर्किल रेट के आधार पर मुआवजा तय कर रही है, जबकि वर्तमान में जमीन का बाजार मूल्य कई गुना बढ़ चुका है।

उनका कहना है कि जिस जमीन की आज कीमत लगभग 15 लाख रुपये प्रति कट्ठा है, उसके बदले एक लाख रुपये के आसपास मुआवजा देना सरासर अन्याय है।किसानों का गुस्सा केवल रकम तक सीमित नहीं है, बल्कि नीति की दोहरी व्यवस्था पर भी है। उनका कहना है कि जमीन की रजिस्ट्री के समय सरकार नए सर्किल रेट पर टैक्स वसूलती है, लेकिन जब जमीन अधिग्रहण की बात आती है तो पुराने रेट का सहारा लिया जाता है।इसे किसान “कानूनी लूट” करार दे रहे हैं।किसान बेंद्र तिवारी ने उदाहरण देते हुए बताया कि उनकी लगभग 0.4942 हेक्टेयर (करीब दो बीघा) जमीन के लिए 49 लाख रुपये से कुछ अधिक मुआवजा तय किया गया है, जो मौजूदा बाजार दरों की तुलना में बेहद कम है।

उनका कहना है कि इस रकम में न तो वैकल्पिक जमीन खरीदी जा सकती है और न ही आजीविका की भरपाई।इसी असहमति का नतीजा है कि चार वर्षों में अब तक केवल 78 प्रतिशत भूमि अधिग्रहण ही हो सका है। बाईपास परियोजना कागजों में आगे बढ़ती रही, लेकिन जमीन पर एक ईंट तक नहीं रखी जा सकी। प्रशासन ने अब किसानों को अधिग्रहण के लिए अल्टीमेटम दिया है, जबकि किसान साफ कह रहे हैं कि उचित मुआवजा नहीं, तो जमीन नहीं।अब सवाल यह है कि क्या सरकार किसानों की जमीन सस्ती लेकर विकास की सड़क बनाएगी, या मुआवजे की जंग में बाईपास की फाइलें ही धूल खाती रहेंगी।

