करोड़ों की ‘स्वच्छता’ फाइलों में कैद, डुमरांव नगर परिषद में जंग खा रही मशीनें
डुमरांव नगर परिषद में स्वच्छता व्यवस्था सुधारने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जमीन पर हालात ऐसे हैं कि महंगी मशीनें उपयोग से पहले ही कबाड़ बनने लगी हैं। करीब एक करोड़ रुपये की लागत से खरीदी गई दो अत्याधुनिक कम्पेक्टर मशीनें पिछले आठ महीने से निष्क्रिय पड़ी हैं। एक वाहन नगर परिषद परिसर में धूल फांक रहा है, जबकि दूसरा छठिया पोखर के पास बिना उपयोग के खड़ा है।


__ एक करोड़ की दो कम्पेक्टर मशीनें आठ माह से बंद, पुराने वाहन पहले ही बने कबाड़; अब खरीद प्रक्रिया और सरकारी धन के इस्तेमाल पर उठे सवाल
केटी न्यूज/डुमरांव :
डुमरांव नगर परिषद में स्वच्छता व्यवस्था सुधारने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जमीन पर हालात ऐसे हैं कि महंगी मशीनें उपयोग से पहले ही कबाड़ बनने लगी हैं। करीब एक करोड़ रुपये की लागत से खरीदी गई दो अत्याधुनिक कम्पेक्टर मशीनें पिछले आठ महीने से निष्क्रिय पड़ी हैं। एक वाहन नगर परिषद परिसर में धूल फांक रहा है, जबकि दूसरा छठिया पोखर के पास बिना उपयोग के खड़ा है। लगातार खुले में पड़े रहने से मशीनों में जंग लगने लगी है और इंजन खराब होने की आशंका भी बढ़ गई है।हैरानी की बात यह है कि इन मशीनों का भुगतान पूरी तरह हो चुका है, लेकिन नगर परिषद अब तक इनके संचालन की व्यवस्था तक नहीं कर सका।

सिर्फ कम्पेक्टर ही नहीं, कई टिपर वाहन भी लंबे समय से बेकार पड़े हैं। रखरखाव के अभाव में सरकारी संपत्ति धीरे-धीरे कबाड़ में बदलती जा रही है।स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई पहला मामला नहीं है। करीब दस वर्ष पहले खरीदी गई एक कम्पेक्टर मशीन भी महज कुछ दिनों तक चलने के बाद बंद हो गई थी। आज वह नगर परिषद भवन के पीछे झाड़ियों और धूल के बीच कबाड़ बनी पड़ी है। ऐसे में नई मशीनों की खरीद को लेकर लोगों के बीच संदेह गहराता जा रहा है।मामला सिर्फ वाहनों तक सीमित नहीं है। नगर परिषद द्वारा बड़ी संख्या में खरीदे गए साइनेज बोर्ड भी उपयोग के अभाव में बेकार पड़े हैं।

जानकारी के अनुसार लगभग चार दर्जन बोर्ड है कबाड़ की स्थिति में हैं। एक बोर्ड की कीमत करीब 35 हजार रुपये बताई जा रही है। यानी इस मद में भी लाखों रुपये खर्च हुए, लेकिन शहर को उसका लाभ नहीं मिला।नगर निवासी गणेश कुमार और उमाकांत राय ने आरोप लगाया कि योजनाओं का उद्देश्य व्यवस्था सुधारने से अधिक सरकारी राशि की निकासी बन गया है। उनका कहना है कि बिना जरूरत और बिना योजना के खरीदारी कर जनता के पैसे की बर्बादी की गई है। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इन खरीदों की जवाबदेही तय कौन करेगा ।

