सरसों की खेती से दूर होते जा रहे हैं केसठ के किसान

एक समय था जब केसठ प्रखंड क्षेत्र के खेतों में चारों ओर पीली सरसों के फूल लहराते नजर आते थे। रबी मौसम में सरसों यहां की प्रमुख नकदी फसलों में गिनी जाती थी। लेकिन बदलते समय और परिस्थितियों के साथ अब किसान सरसों की खेती से धीरे धीरे दूरी बनाते जा रहे हैं। वर्तमान में हालात ऐसे हैं कि पहले जहां सैकड़ों एकड़ में सरसों की खेती होती थी, वहीं अब यह सिमट कर बहुत कम रकबे में रह गई है।

सरसों की खेती से दूर होते जा रहे हैं केसठ के किसान

केटी न्यूज/केसठ। 

एक समय था जब केसठ प्रखंड क्षेत्र के खेतों में चारों ओर पीली सरसों के फूल लहराते नजर आते थे। रबी मौसम में सरसों यहां की प्रमुख नकदी फसलों में गिनी जाती थी। लेकिन बदलते समय और परिस्थितियों के साथ अब किसान सरसों की खेती से धीरे धीरे दूरी बनाते जा रहे हैं। वर्तमान में हालात ऐसे हैं कि पहले जहां सैकड़ों एकड़ में सरसों की खेती होती थी, वहीं अब यह सिमट कर बहुत कम रकबे में रह गई है। किसानों के अनुसार सरसों की खेती छोड़ने का सबसे बड़ा कारण उत्पादन लागत का बढ़ना और अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाना है।

खाद, बीज, कीटनाशक और सिंचाई की लागत लगातार बढ़ती जा रही है, जबकि सरसों का बाजार मूल्य किसानों को संतोषजनक मुनाफा नहीं दे पा रहा। कई किसानों का कहना है कि अगर मौसम थोड़ा भी प्रतिकूल हो जाए तो पूरी फसल प्रभावित हो जाती है, जिससे मेहनत और पूंजी दोनों डूब जाती हैं। इसके अलावा मौसम की मार भी सरसों की खेती पर भारी पड़ रही है। कभी समय पर बारिश नहीं होती, तो कभी अचानक ओलावृष्टि और पाला फसल को नुकसान पहुंचा देता है। पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण सरसों की पैदावार में लगातार गिरावट देखी जा रही है।

ऐसे में किसान गेहूं, चना और सब्जियों जैसी अपेक्षाकृत सुरक्षित फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। किसानों का यह भी कहना है कि सरसों की खरीद के लिए सरकारी स्तर पर ठोस व्यवस्था नहीं है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा तो होती है, लेकिन जमीनी स्तर पर खरीद केंद्रों की कमी के कारण किसान मजबूरी में दलालों को औने पौने दाम पर सरसों बेच देते हैं। इससे उन्हें उचित लाभ नहीं मिल पाता और अगली बार वे इस फसल को बोने से कतराते हैं।स्थानीय किसान बताते हैं कि पहले सरसों की खेती से घर का तेल निकल जाता था और अतिरिक्त उपज बेचकर अच्छी आमदनी भी हो जाती थी।

अब स्थिति यह है कि किसान खुद के उपयोग के लिए भी सरसों बोने से पीछे हट रहे हैं। कुछ किसानों ने बताया कि यदि सरकार बीज, खाद और सिंचाई पर अनुदान दे, साथ ही एमएसपी पर सुनिश्चित खरीद की व्यवस्था करे तो सरसों की खेती को फिर से बढ़ावा मिल सकता है।कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सरसों एक लाभकारी तिलहन फसल है और इससे किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सकती है, लेकिन इसके लिए आधुनिक तकनीक, बेहतर बीज और सरकारी सहयोग जरूरी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में केसठ क्षेत्र से सरसों की खेती पूरी तरह समाप्त होने का खतरा बना रहेगा।