अच्छी पहल: ऐतिहासिक फागुनी पशु मेला बचाने को एकजुट हुआ ब्रह्मपुर

ब्रह्मपुर की पहचान केवल एक कस्बे भर की नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही एक जीवंत परंपरा की है। बाबा बरमेश्वर नाथ मंदिर और उससे जुड़ा एशिया प्रसिद्ध ऐतिहासिक फागुनी पशु मेला इस पहचान की रीढ़ माने जाते हैं। हाल के दिनों में इस मेला को लेकर उठी आशंकाओं और चर्चाओं के बीच रविवार को ब्रह्मपुर में हुई बैठक ने साफ कर दिया कि यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि लोगों की आस्था, रोज़गार और सांस्कृतिक विरासत का सवाल है।

अच्छी पहल: ऐतिहासिक फागुनी पशु मेला बचाने को एकजुट हुआ ब्रह्मपुर

-- सांस्कृतिक अस्मिता, आजीविका और इतिहास के सवाल पर उठा जनस्वर, मेला बरकरार रखने का ग्रामीणों ने लिया सामूहिक संकल्प

केटी न्यूज/ब्रह्मपुर

ब्रह्मपुर की पहचान केवल एक कस्बे भर की नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही एक जीवंत परंपरा की है। बाबा बरमेश्वर नाथ मंदिर और उससे जुड़ा एशिया प्रसिद्ध ऐतिहासिक फागुनी पशु मेला इस पहचान की रीढ़ माने जाते हैं। हाल के दिनों में इस मेला को लेकर उठी आशंकाओं और चर्चाओं के बीच रविवार को ब्रह्मपुर में हुई बैठक ने साफ कर दिया कि यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि लोगों की आस्था, रोज़गार और सांस्कृतिक विरासत का सवाल है।समाजसेवी सुरेंद्र सिंह की अध्यक्षता में मंदिर परिसर के समीप आयोजित इस बैठक में सैकड़ों की संख्या में स्थानीय नागरिक, जनप्रतिनिधि, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता जुटे।

बैठक का माहौल सामान्य चर्चा से आगे बढ़कर एक जनचेतना सभा का रूप ले चुका था, जहां हर वक्ता की चिंता एक ही थी कि फागुनी पशु मेला किसी भी सूरत में खत्म या सीमित न हो।वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि ब्रह्मपुर का फागुनी पशु मेला केवल व्यापारिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है। यह मेला खासतौर पर घोड़ों के लिए जाना जाता रहा है और दशकों तक दूर-दराज के राज्यों से व्यापारी यहां आते रहे हैं। इससे न केवल क्षेत्र की पहचान बनी, बल्कि स्थानीय लोगों की आजीविका भी इससे जुड़ी रही है। मेला के समय होटल, परिवहन, छोटे दुकानदार और मजदूर वर्ग तक को रोजगार मिलता है।अध्यक्षीय संबोधन में सुरेंद्र सिंह ने दो टूक कहा कि यदि इस ऐतिहासिक परंपरा से छेड़छाड़ की कोशिश की गई तो जनता चुप नहीं बैठेगी।

उन्होंने कहा कि सरकार एक ओर धरोहर संरक्षण की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ ऐसे प्रयास दिख रहे हैं जो इतिहास को मिटाने की ओर इशारा करते हैं। ब्रह्मपुर की पहचान बाबा बरमेश्वर नाथ मंदिर और फागुनी पशु मेला से है, और यही इसकी आत्मा है।बैठक में इतिहास के पन्ने भी पलटे गए। वक्ताओं ने बताया कि जैसे सोनपुर का हरिहर क्षेत्र पशु मेला विश्व प्रसिद्ध है, वैसे ही ब्रह्मपुर का फागुनी पशु मेला भी अपने विशेष स्वरूप के कारण ऐतिहासिक महत्व रखता है। घोड़ा मेला के रूप में इसकी अलग पहचान रही है, जिसने बक्सर जिले को राष्ट्रीय मानचित्र पर एक खास स्थान दिलाया।चर्चा के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि हाल ही में एक प्रमुख अखबार में मेला क्षेत्र को लेकर प्रकाशित रिपोर्ट में प्रतिबंधित क्षेत्र को छोड़कर अन्य चिन्हित इलाकों में मेला आयोजन की संभावना जताई गई थी।

साथ ही यह भी बताया गया कि मेला से सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती रही है। इस आधार पर लोगों ने प्रशासन से सकारात्मक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की मांग की।राजद के राज्य परिषद सदस्य दामोदर यादव ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि मेला के स्वरूप में अनावश्यक हस्तक्षेप हुआ तो आंदोलन तय है। उन्होंने इसे जनआस्था और रोज़गार से जुड़ा विषय बताते हुए कहा कि जनता किसी भी साजिश को सफल नहीं होने देगी। वहीं वक्ता टाना यादव ने कुछ व्यक्तियों पर आरोप लगाया कि निजी स्वार्थ के तहत प्रशासनिक अनुमति का दुरुपयोग कर मेला को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, जिससे व्यापारियों को भड़काया जा सके।

बैठक के अंत में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर प्रशासन से मांग की गई कि फागुनी पशु मेला का आयोजन पूर्ववत स्वरूप में सुनिश्चित किया जाए। लोगों ने साफ कहा कि यह केवल एक मेला नहीं, बल्कि ब्रह्मपुर की सांस्कृतिक विरासत है, जिसे हर हाल में संरक्षित किया जाना चाहिए। इस बैठक ने एक स्पष्ट संदेश दे दिया कि ब्रह्मपुर अपनी पहचान और इतिहास के साथ किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं है।बैठक में नगर पंचायत प्रतिनिधि राकेश महतो, सुभाष यादव, छवि नंदन पांडे, भारत वर्मा, त्रिपाठी, मनोज पांडे, अवधेश पांडे, चंद्र मोहन पांडे, डॉक्टर शकीरा सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।