नीलगाय बनी किसानों की नई सहयोगी, मल से बढ़ेगा मछली उत्पादन

फसलों को नुकसान पहुंचाने वाली नीलगाय अब किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बन सकती है। डुमरांव प्रखंड के सम्हार गांव में नीलगाय के मल का उपयोग कर जैविक मत्स्य पालन का अनोखा प्रयोग शुरू किया गया है। कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में चल रहा यह प्रयास मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है।

नीलगाय बनी किसानों की नई सहयोगी, मल से बढ़ेगा मछली उत्पादन

__ डुमरांव के सम्हार गांव में अनोखा प्रयोग, जैविक मत्स्य पालन से कम लागत में अधिक मुनाफे की उम्मीद

केटी न्यूज/डुमरांव

फसलों को नुकसान पहुंचाने वाली नीलगाय अब किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बन सकती है। डुमरांव प्रखंड के सम्हार गांव में नीलगाय के मल का उपयोग कर जैविक मत्स्य पालन का अनोखा प्रयोग शुरू किया गया है। कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में चल रहा यह प्रयास मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है।यह प्रयोग बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर की अंगीभूत इकाई वीर कुंवर सिंह कृषि महाविद्यालय, डुमरांव के सहायक प्राध्यापक-सह-कनीय वैज्ञानिक डॉ. सुदय प्रसाद की देखरेख में किसान अक्षय कुमार के तालाब पर किया जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार नीलगाय के मल में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश सहित कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो तालाब की जैविक उर्वरता बढ़ाने में सहायक हैं।

डॉ. सुदय प्रसाद ने बताया कि नीलगाय के मल के प्रयोग से तालाब में प्लैंकटन और अन्य सूक्ष्म जलीय जीवों का विकास तेजी से होता है। ये जीव मछलियों के लिए प्राकृतिक भोजन का कार्य करते हैं, जिससे उनकी वृद्धि दर बढ़ती है और उत्पादन में सुधार देखने को मिलता है। प्रारंभिक परिणाम उत्साहजनक रहे हैं तथा उत्पादन लागत में भी कमी आने के संकेत मिले हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मददगार साबित होगी। इसके उपयोग से जल की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है। यही कारण है कि इसे टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल मत्स्य पालन मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।

महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. पारस नाथ ने कहा कि यदि यह प्रयोग व्यापक स्तर पर सफल होता है तो प्रदेश के हजारों किसानों और मत्स्य पालकों को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। उन्होंने बताया कि यह मॉडल एकीकृत जैविक कृषि एवं मत्स्य प्रणाली को मजबूत करता है, जिससे सीमित संसाधनों का अधिकतम उपयोग संभव हो पाता है।क्षेत्र के किसानों में भी इस पहल को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। कई किसान अपने तालाबों में इस तकनीक को अपनाने की इच्छा जता रहे हैं। जनसंपर्क पदाधिकारी डॉ. मजहर अंसारी ने बताया कि सकारात्मक परिणाम मिलने पर इस मॉडल को बिहार के अन्य जिलों और देश के विभिन्न राज्यों में भी विस्तार दिया जा सकता है। इससे जैविक मत्स्य पालन को नई पहचान मिलेगी और किसानों के लिए आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित होंगे।