जिला स्तरीय खेल प्रतियोगिता पर उठे सवाल, सीमित भागीदारी के बीच बांटे गए पुरस्कार
जिला मुख्यालय स्थित किला मैदान में माय भारत बक्सर के तत्वावधान में आयोजित जिला स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिता संपन्न तो हो गई, लेकिन इसके आयोजन की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि प्रतियोगिता का आयोजन व्यापक भागीदारी के बजाय औपचारिकता निभाने तक सीमित रहा और कम उपस्थिति के बावजूद जल्दबाजी में विजेताओं की घोषणा कर पुरस्कार वितरण कर दिया गया।

केटी न्यूज/बक्सर
जिला मुख्यालय स्थित किला मैदान में माय भारत बक्सर के तत्वावधान में आयोजित जिला स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिता संपन्न तो हो गई, लेकिन इसके आयोजन की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि प्रतियोगिता का आयोजन व्यापक भागीदारी के बजाय औपचारिकता निभाने तक सीमित रहा और कम उपस्थिति के बावजूद जल्दबाजी में विजेताओं की घोषणा कर पुरस्कार वितरण कर दिया गया।जागृति संस्थान, सौंवा बांध पवनी के संजय कुमार गोंड़ ने आरोप लगाया कि माय भारत के तहत आयोजित इस जिला स्तरीय प्रतियोगिता में जिले भर से बड़ी संख्या में खिलाड़ियों की भागीदारी होनी चाहिए थी, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत रही।

उनके अनुसार प्रतियोगिता में मुख्य रूप से बक्सर और नावानगर के ही गिने-चुने खिलाड़ी शामिल हुए, जबकि अन्य प्रखंडों की भागीदारी लगभग नहीं के बराबर रही।उन्होंने बताया कि फुटबॉल प्रतियोगिता में बक्सर और नावानगर की टीमों के बीच पूरा मुकाबला कराने के बजाय केवल ट्राइब्रेकर के आधार पर नावानगर को विजेता घोषित कर दिया गया। वहीं महिला कबड्डी प्रतियोगिता में सिर्फ नावानगर टीम के पहुंचने से उसे वॉकओवर देकर विजेता घोषित कर दिया गया। इससे प्रतियोगिता की निष्पक्षता और गंभीरता पर प्रश्न उठने लगे हैं।जानकारी के अनुसार राजपुर और चौसा की टीमें किसी भी प्रतियोगिता में शामिल नहीं हुईं। इसके बावजूद उपस्थित प्रतिभागियों को पुरस्कार देकर सम्मानित कर कार्यक्रम समाप्त कर दिया गया।

बताया जाता है कि मुख्य प्रतियोगिता का आयोजन शनिवार को किया गया, जबकि इससे पहले 14 फरवरी को महिला दौड़, बैडमिंटन और महिला लंबी कूद प्रतियोगिता भी आयोजित की गई थी। उन प्रतियोगिताओं में भी प्रतिभागियों की संख्या अपेक्षा से काफी कम बताई गई।स्थानीय खेल प्रेमियों और संबंधित लोगों का कहना है कि जिला स्तरीय प्रतियोगिता का उद्देश्य प्रतिभाओं को मंच देना होता है, लेकिन जब आयोजन में ही व्यापक भागीदारी सुनिश्चित न हो सके तो उसकी सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब देखना होगा कि इस मामले में संबंधित विभाग या आयोजक पक्ष की ओर से क्या सफाई सामने आती है।

