फसल के दुश्मन से खेत का साथी बनाने की कोशिश, डुमरांव के नीलगाय शोध ने सबौर मेले में बटोरी सुर्खियां
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में आयोजित तीन दिवसीय कृषि मेला इस बार डुमरांव में चल रहे एक अनोखे शोध के कारण खास चर्चा में रहा। आम तौर पर किसानों के लिए फसल नुकसान का कारण मानी जाने वाली नीलगाय को अब कृषि वैज्ञानिक एक नई दृष्टि से देख रहे हैं। डुमरांव में चल रहे शोध ने यह संकेत दिया है कि यदि नीलगाय को नियंत्रित, व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से पालतू बनाया जा सके, तो यह केवल समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जैविक खेती के लिए एक उपयोगी संसाधन भी बन सकती है।

-- नीलगाय के व्यवहार, पालन और गोबर की उपयोगिता पर चल रहे अध्ययन ने खोले संभावनाओं के नए दरवाजे, जैविक खेती, वैकल्पिक आय और ग्रामीण संसाधन विकास पर टिकी नजर
केटी न्यूज/डुमरांव
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में आयोजित तीन दिवसीय कृषि मेला इस बार डुमरांव में चल रहे एक अनोखे शोध के कारण खास चर्चा में रहा। आम तौर पर किसानों के लिए फसल नुकसान का कारण मानी जाने वाली नीलगाय को अब कृषि वैज्ञानिक एक नई दृष्टि से देख रहे हैं। डुमरांव में चल रहे शोध ने यह संकेत दिया है कि यदि नीलगाय को नियंत्रित, व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से पालतू बनाया जा सके, तो यह केवल समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जैविक खेती के लिए एक उपयोगी संसाधन भी बन सकती है। कृषि मेले में इस शोध के तहत पाले जा रहे नीलगाय के बच्चों का प्रदर्शन किया गया, जिसने किसानों, वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों और आगंतुकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

विश्वविद्यालय के निर्देश पर प्रस्तुत इस शोध मॉडल को देखने के लिए मेले में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। विश्वविद्यालय के डायरेक्टर रिसर्च डॉ. अनिल कुमार और कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह के मार्गदर्शन में यह कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है। शोध टीम के प्रमुख सदस्य डॉ. सुदय प्रसाद ने नीलगाय पर किए जा रहे अध्ययन की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस पहल का मूल उद्देश्य किसानों की उस पुरानी समस्या का समाधान खोजना है, जिसमें नीलगाय की वजह से फसलों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। वैज्ञानिकों ने इसी संकट को अवसर में बदलने की सोच के साथ नीलगाय के बच्चों को पालकर उनके स्वभाव, खान-पान, अनुकूलन क्षमता और उपयोगिता का अध्ययन शुरू किया।

डॉ. सुदय प्रसाद के अनुसार पिछले चार वर्षों से यह शोध लगातार जारी है। इस दौरान नीलगाय के बच्चों को नियंत्रित वातावरण में रखकर उनके विकास और व्यवहार का सूक्ष्म निरीक्षण किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि उचित देखभाल और अनुकूल माहौल मिलने पर नीलगाय के बच्चों में पालतू प्रवृत्ति विकसित की जा सकती है। यही नहीं, उनके रहन-सहन और व्यवहार से जुड़े ऐसे कई संकेत मिले हैं, जो भविष्य में इस दिशा में बड़े स्तर पर प्रयोग का आधार बन सकते हैं।इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष नीलगाय के गोबर की उपयोगिता को लेकर सामने आया है। वैज्ञानिकों के अनुसार परीक्षण में यह पाया गया कि नीलगाय का गोबर पोषक तत्वों से भरपूर है और जैविक खेती के लिए एक प्रभावी विकल्प बन सकता है।

इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम के साथ-साथ कैल्शियम और मैग्नीशियम भी पर्याप्त मात्रा में पाए गए हैं। ये सभी तत्व मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, उसकी संरचना सुधारने तथा जलधारण क्षमता मजबूत करने में सहायक माने जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि इस पर आगे और व्यवस्थित कार्य किया गया, तो नीलगाय का गोबर प्राकृतिक खाद, मिट्टी सुधारक, ईंधन और ग्रामीण उपयोग के अन्य वैकल्पिक साधनों के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।कृषि मेले में इस शोध को विशेष सराहना भी मिली। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने भी इस पहल की प्रशंसा करते हुए इसे किसानों के हित में उपयोगी प्रयास बताया।

शोध से जुड़ी परियोजना को केंद्र और राज्य सरकार की ओर से 114.85 लाख रुपये की स्वीकृति मिलना भी इस बात का संकेत है कि इस प्रयोग को नीति स्तर पर गंभीरता से देखा जा रहा है।डुमरांव की यह शोध पहल अब केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग भर नहीं रह गई है, बल्कि इसे खेती, पर्यावरण और ग्रामीण आय के नए मॉडल के रूप में भी देखा जाने लगा है। जिस नीलगाय को अब तक खेतों के लिए संकट माना जाता था, उसी को संसाधन में बदलने की यह कोशिश आने वाले समय में कृषि क्षेत्र के लिए नई दिशा तय कर सकती है।

